Poetry is fascinating stuff, and we are still not sure what it means. Is it rhythm, metre, the use of figures of speech, or high imagery to express various emotions and realities of life that set it apart from prose? Yet many forms of poetry, especially the modern ones, do not conform to classical understandings of poetry, as they often prioritise free verse and personal expression over traditional structures and rules. The sense of rhythm and music, perhaps, is important. Or maybe not. The only advantage for poetry appears to be that the original can never be twisted while the interpretations may change. Prose, across time, can undergo many modifications that poetry appears to be resistant against.
Anyway, I have this passion for expressing my thoughts in what I feel to be a poetic language. I started off with long poems which nobody listened to or understood. My target audience consists of my walking group members, who generally struggle with their knowledge of the Hindi language. So, under pressure from them, I turned my thoughts into four-line capsules and called them “shaayaris”. I also have no clue what the latter actually means. But my walking friends understand more of what I try to say. Our juice vendor, a rare exception, is my constant supporter, providing us with refreshing orange juice at the end of the walk. He hails from UP, and perhaps he is missing his homeland, which makes him request me to recite one more shaayari. Only a small number of people do that. In fact, I can count on my fingers in one hand how many people have asked me to repeat or recite another poem. Anyway, these gems from the last decade are for any interested reader, some good, some not so good. Generally, the best time to recite these shaayaris is when most of the audience members are a little drunk. Such states simply overlook all the deficiencies. I generally use that trick to keep myself content. Too critical a people upset me, especially those Hindi fanatics who look at the gender agreement of the words.
HINDI SHORT POETRY
दम नहीं दुनिया में जो हमें मिटा सके
दम नहीं दुश्मनो में जो हमें गिरा सके
करिश्मा है यह अपनी दोस्ती का यारों
ख़ुदा भी हमें इस दुनिया से उठा न सके (1)
दोस्त हमें छोड़ कर दर्द दे गए
यादें कितनी सुहानी दे छोड़ गए
ढलती शाम किसी दोस्त की महफ़िल में
आप का ना होना दिल घायल कर गए (2)
हुस्न को प्यार से देखो ज़रा
दिल खामोश ही धडकनो दो ज़रा
फूल के खुशबू का एहसास हो ज़रा
पर सोच कुचलने का ना आये ज़रा (3)
ज़िन्दगी का अंदाज़ यही है यारों,
हर ख़ुशी मनाओ जैसे त्योहार हो,
हारी हुई हर बाज़ी को भूल कर यारों,
दर्द का दर्ज़ा तो सिर्फ पैरो की धूल हो. (4)
रंग, रूप, जात, धर्म देखा जब इक दोस्त में
हज़ार टुकड़े हुए दोस्ती के, बिखरे बाज़ारों में
अटूट रहा ड़ोर दोस्ती के पाक रिश्तों में
देखा एक भगवन का रूप, हर दोस्त के चेहरे में. (5)
दर्द ही उठा ऐ दिल, इस बेदर्द सी जहान में,
दिल तड़पा है सदा , चला जब खुशियों के आस से,
वो फूल ना मुरझाये सिर्फ एक राह में ,
झूमा जब जहान में, बिन किसी भी चाह से. (6)
एक राह छूटी तो दूसरी जुडी
ज़िन्दगी के कई रस्ते किस्मत ने बदली
गम ना कर राह पे चले राही
कोशिश ना छोड़, चूमना है कदमो को तरक्की. (7)
वीर कहे उसको जो दुनिया से ना डरा
यही बात लेके जहां में मेरा कदम बढा
एहसास हुआ आज, झूटी तरक्की की राह पे
परमवीर वही है, जिससे दुनिया भी ना डरा. (8)
कडी धूप में चलता हूँ रोज, दोस्तों के संग
दुनिया के कटाक्ष के है हज़ारों रंग
ठंडक इतनी है दोस्ती का, दुनिया हुआ दंग
आग सूरज का भी बने बर्फ, हम दोस्तों के संग. (9)
छल कपट की जीत को देखू जब जहां में,
दर्द से तड़पा है दिल, उछला यह जग इस जीत से,
कांच के ही महल बने झूट की बुनियाद पे,
क़यामत तक सच की कोठी, हाँ मगर कुछ देर से. (10)
प्यार करने को चला, इंसानो और दुनिया को तू,
बस एक ही वो बात है, की काबिल हुआ है तू,
उठा कदम घर आँगन से पहले,
क्या प्यार से चूमा, अपने ही आयने को तू. (11)
जी लू ज़िन्दगी को कुछ पल प्यार से
आशा यही रही इस दिल को जहान से
अजीब है दुनिया जो दौड़ा, बेकार ही मौत से
फिर जनम न हो यही मांगू भगवान से. (12)
माँ-बाप, भाई-बहन और दुनिया का देखा प्यार
अनेक रंग और अंदाज़ से महका यह प्यार
राज़ ना जाना पर एक बात तो साफ़ मेरे यार
बसा है जहा डर, कभी हुआ ना वहा प्यार. (13)
सोचु कभी कितना महान हूँ मैं,
बिन मेरे कितनी मुश्किलें जहान में,
महापुरुष कितने आये, गिना खुद को मैं,
मूर्ख दुनिया युगो से चली अपने आप में. (14)
मिटटी के खिलोने और बेरंग चित्र थे,
छोटी जीवन लेकिन गहरे रंगो से भरे थे,
रंगहीन जीवन लम्बी आज सुनहरे खिलोनो से,
सतरंगी सिर्फ वैद की गोलियां जो उतरे इस गले से. (15)
कह दू बेटी के जन्मदिन पर आज
दुनिया में झूम ख़ुशी को बनाके ताज़
रोये ना तू ना रुलाये जग को मेरे नाज़
खूब हंसे तू, और दुनिया हंसे सुन के तेरे अलफ़ाज़. (16)
रंगीन सुबह फैले या नशा भरी शाम हो,
झूमते बारिश का फलक या उदासी भरी रात हो,
मौसम बदले रंग या रिश्तों में दरारे हो,
हर दर्द और ख़ुशी संभला, जब दोस्तों का साथ हो. (17)
जीत को चाँद पे ख़ुशी से बिठा दिया
तरक्की पर जहान ने ख़ुदा ही बना दिया
क्रूर दुनिया का क्या रंग रहा
एक सीडी फिसली तो ज़िंदा ही गाड़ दिया. (18)
शोर और आवाज़ से गूंजा बेबस जहां
जबान भरा हज़ारों बातों से बेकार यहां
तरीके गहरे कई चिल्लाने के राह में यहां
अफ़सोस कुछ भी ना सुना बहरा और बेदर्द जहां. (19)
धर्म माना की खुद को त्यागा घर के लिए,
घर छूटा देश के लिए, देश इंसानियत के लिए,
इंसान बह गया मुश्किलों में संसार के लिए,
धर्म आखिर यही रहा की छोड़ संसार भगवान् के लिए. (20)
जन्मदिन पर उम्र ही आया कहा मेरे दोस्त ने,
उम्र के साथ ज्ञान भी आता तो रहता कुछ शान से,
फर्क नहीं यहाँ की दोस्त को बक्शा उम्र, बुद्धि, या ज्ञान ने,
दिल में वही प्यार बसे जिससे कदम मेरे उठे शान से. (21)
तेरे हर जीत पर ख़ुशी के गीत गा लू मैं
हार और आंसू पर गले लग कर मीत बनू मैं
मजबूत जड़े बनाकर वक़्त आने पर आज़ाद छोडूं मैं
कुछ और नहीं है पितृ धर्म, कहू ज़माने से आज मैं. (22)
पल पल जी लू, पल पल जीतू,
पल पल जग में मोती खोजू,
फैला प्यार बचे वक़्त में मूरख तू,
पल पल कब्र को ही चला तू. (23)
हार और जीत का खेल है ज़िन्दगी
धूप-छाँव का अजीब मेल है ज़िन्दगी
सीढी ही रहा सिर्फ, हार तो जीत की
घायल ज़मीन पर, हौसला रख आसमान को छूने की. (24)
घरे विशाल और गाड़ियां हुई लम्बी
विदेश भ्रमण हुए कितने हलकी
तारो के महल है और स्वाद के मेले भी
क्या एक कण भी रिश्तें हुए इनसे गहरी. (25)
खून से रंगे थे बाते कई पुरानी
इंसानी कल्पना ने चित्रों को है बदली
क्या रहा खूब इतिहास की अदा
बना ही दिया शैतान को भी ख़ुदा. (26)
पादरी, पुजारी हो या इमाम
गलती हर धर्म के स्थलों में अंजान
दोष नहीं यह धर्म का पहचान
कुछ ही रहे दुनिया में भगवान्
यह सब तो है आखिर सिर्फ इंसान. (27)
दौलती इंसान के दान में क्या दम है
भूके के दिए दाने मोती से भी क्या कम है
ज़िंदादिली की पहचान तो मुश्किलों में होती है
चन्दन ही है जो कुचलने पर महक देती है. (28)
देख कर मुझको क्यों तू रोया
नफरत में जलकर क्यों नींद को खोया
रहे हाथ मेरे पैरो से अलग क्या
मेरा ही भाग है, कभी था क्या मुझसे जुदा. (29)
ना नाम हूँ न काम हूँ
ना धर्म हूँ न कर्म हूँ
ना देश हूँ न जात हूँ
मैं तो सिर्फ मैं ही हूँ
तू भी सदा मैं ही हूँ. (30)
मुश्किल है समझना नाचीज़ को जहान
इंसानो की नकाब पहन के घूमे है शैतान
नकाब पर नकाब निकाला भगवन का लिए नकाब
मूल जब अचंभा देखा भगवन ही था हर शैतान. (31)
ठीक था बचपन के दिन, बसी थी सिर्फ नादानी
दोस्ती थी खूब और क्षणिक थी दुश्मनी
जात धर्म से रंगी आज हर दोस्ती और दुश्मनी
सिर्फ दुश्मन रहे कब्र तक, दोस्त और ख़ुशी का नाम नहीं. (32)
कीमती था खिलौना हाथो का ठूठ गया
लापरवाह दुनिया पर बेकार रूठ गया
साश्वत समझ कर पगले का जान निकल गया
ज़िन्दगी से जान छीनकर तो खिलोने को ज़िंदा किया. (33)
अतीत की यादें और भविष्य के सपने
फिसलते रेत है, ना बने इन पर ख़ुशी के महले
इस पल में महके ब्रह्माण्ड के हर नशे
झूम इस पल में और सच कर पूरे सपने. (34)
क्या खूब रहा सुंदरता की भ्रांत इतिहास
चेहरे पर मरे हीर, शिरीन और देवदास
गलती एक ही सदियों से इंसानो की ख़ास
दूर रहकर दिल दिमाग से छोड़ा कीमती साँस. (35)
माना हर शैतान में बसा भगवान्
गले लगाकर ढूँढू शायद नहीं मेरा काम
तेरी मंज़िल नहीं दुनिया में किसी और का पैगाम
दौड़ तेरी जन्मों का, आखरी मंज़िल है भगवान्. (36)
नया साल का सन्देश
दौड़ है क्यों फिसलती मंज़िलों के लिए
अंगार क्यों जलाये अपने कदमो के तले
क्यों ढूंड रहा समुन्दरों में मोती को हाथ में लिए
इसी पल को चूम ले जीने के लिए
हर सांस को नया जनम समझ मेरे यार
खुला आँख जब नया वर्ष बना दिलदार
थाम ले हर पल को तू दिल से ऐसे यार
मरना है ज़िन्दगी में सिर्फ एक बार. (37)
माँ बाप के ख्वाबो से शुरू हुआ तू
पोतो की यादों में अंत हुआ तू
हर सांस को भी बाँधा ख्वाबो और यादों से तू
इस पल में जीना छोड़ा, ख़ुशी सदा ही डूंडा तू. (38)
भ्रष्ट हुआ कलाकार तो हैरान क्यों हो गया
हर प्रतिभावान को जल्दी से भगवान बना दिया
गज़ब इंसानो की रूखी सोच रहा
कला भगवान का रूप, कलाकार तेरी तरह इंसान रहा. (39)
चंचल नदियों पे उछलती, जीवन की कमजोर नौका,
झूम के बारिश गिरा, दूजे पल पानी को तरसा,
घमंडी ज़िन्दगी का पता नहीं कब और कैसे लगे धोका,
जन्मदिन का सन्देश भेजा, अगले क्षण मौत पे रो बरसा. (40)
क्या रूप और परिभाषा दिया इस प्यार को
कैसे चाहूँ अपने धर्म और अपने देश को
पूँछा कैसे नापेगा मेरे घर प्रति प्यार को
बोला जितने जोर से तोड़ेगा पड़ोस के घर को
अफ़सोस सी बात तकलीफ दे ज़िन्दगी को
दूजे पे नफरत बनाया अपनों से प्यार के निशानी को. (41)
रिश्ता तोडा और दिवस बनाया, विदेशी रोग खूब लगा,
घांव लगा कर गज़ब सा, मलहम ठंडा लेप दिया
सूरज, चाँद, ज़मीन, आसमान हर पल तेरा एहसान रहा
इन से भी ज़्यादा माँ रही, दिवस उसका तो मज़ाक हुआ. (42)
पलक झपका तो ज़िन्दगी ही निकल गये,
पलक झपका तो रिश्ते भी छूट गये,
पलक झपका नाऔर क्यों ज़िन्दगी बेचैन खेल लिए,
पलक ही झपका ना दुनिया, जब खेल खत्म हो गये. (43)
सुंदरता की खोज में, भटकू दुनिया में दूर मैं,
समुंदरों में तैरू कभी, जंगलों में झूमु मैं,
थका हुआ जब घर को आया, पाया उत्तम सुंदरता मैं,
बच्चे की हंसी और माँ की दुआ, खोजु नहीं अब और मैं. (44)
अजीब सा ज़िन्दगी का दिमागी खेल रहा
क्षणिक आनंद की जाल में, मुश्किलों में बुरा फंसा
कर्मो का फल लिए, फ़ूट के रोया और लाचार रहा
फल का ही विष लेकर, लाखो जन्मों में गिरता रहा. (45)
बूढा शारीर हुआ, काल चक्र घुमाने क्यों तड़पा
रुकी दुनिया की हंसी क्या, दिमाग तो सिकुड गया,
भगवान तो सदा से है, कभी भी क्या तू मर सका
भूल इस ख़ुशी को तू, जन्मों तक क्यों रोता गया. (46)
तड़प नहीं कुछ कहने का, सुन ने की कोई चाह नहीं,
रिश्तों से ना चाह रहा, अपनों से भी आस नहीं,
दोस्त से शिकवा कहाँ, दुश्मन सभी माफ़ सही,
मोह नहीं किसी जन्नत का, मरने का कोई खौफ नहीं,
ख़ुशी से झूमा पल पल यहाँ, भगवान कही और नहीं. (47)
जम कर क्या खूब दुश्मन ने रुसवा किया,
नफरत को बड़े ही प्यार से निभा दिया,
उसी प्यार में जब ख़ुदा को ही देख लिया,
कहाँ दुश्मनी, दुश्मन तो मेरा दर्पण बन गया. (48)
शिक्षा, संस्कार, प्रतिष्ठा, और भाग्बान,
लाखो जन्मों बाद बने फूल की पहचान,
क्रोध और मोह में कैसा गिरा इंसान,
कांच सा फूटा दीवार, पल में बना वह शैतान. (49)
कुछ ही गले काटा कभी, आज उन्नत हुआ इंसान,
नेता ने जब ऊँगली दबाई, शहर हुए पूरे शमशान,
जंगलों को राख बनाकर, जानवरों का किया विनाश,
मन को सुन्दर धोका देकर, नाम दिया इसका विज्ञान. (50)
जितना जोर से हँसा में, दर्द तो उतना छुपा रहा,
नफरत कहाँ, चाह का मैला दर्पण रहा,
राहो में दिखी मुझे, अंजान सा सर फेर लिया,
कुछ नहीं और, यह नादान का अटूट प्यार रहा. (51)
महलो और मंदिरों में, कैसे दिल ने जन्नत ढूंढा,
दर्द और गरीबी को, नर्क का ही मूरत समझा,
स्वर्ग-नर्क एक जादू रहा, पगले इस दिमाग का,
घाव और दर्द भी स्वर्ग बना, शांत जब यह मन हुआ. (52)
रंग कई चित्र में, किस रंग से है मुझको प्यार,
सुनहरा श्वेत सबसे शुद्ध, चित्र का रहा आधार,
ज़िन्दगी का भी चित्र है, भीड़ रंग के कई हज़ार,
दुआ माँ-बाप का अनमोल रंग, खेलु हर रंग से बेशुमार. (53)
फूल बिखरे इधर-उधर, सुन्दर इक गुलदस्ता से,
देश के लोग बंधे हुए, कमज़ोर ही एक डोर से,
सिपाही मरे देश के खातिर, सरहदों पे गोली से,
जात, धर्म, और नदी के खातिर, वासी झगडे इक दूजे से. (54)
इंकार नहीं गर्व मुझको, है देश, धर्म, और जात से,
मंज़िल की राहो में महके, फूल यह बहार के,
कीमत लगा दूँ इंसान की, गर इन फूलों के रंग से,
धर्म शायद समझा नहीं, बने फूल सिर्फ कागज़ के. (55)
अफ़सोस ज़िन्दगी के कितने अफ़साने हुए
जब भी ख़ुशी चाहा, गम के तराने हुए,
उठा जब भी कदम तरक्की की आस लिए,
हज़ार कदमे भिड़े हमसे, ज़मीन पर गिराने के लिए. (56)
दोस्तों के नये झुण्ड अजीब निर्माण हो रहे,
सूनेपन में रिश्तों का जादू बना रहे,
शुरू हर बात पर तालिया बजते थे,
समय बीता तो दुनिया जीतने पर भी चुप रहे. (57)
नफरत से दुनिया को घूरता हूँ मैं,
डर से बार-बार दुनिया से भागा हूँ मैं,
क्यों इतना बेचैन हुआ दुनिया से मैं,
मैले मन का दर्पण ही है जो देखू सदा मैं. (58)
कितना अलग है दुनिया का हर इंसान,
फिर भी दुनिया में कितना एक रहा इंसान,
खुद की सोचा और अकेला ही चला इंसान,
चला अकेला और दुनिया में एक हुआ इंसान. (59)
धर्म रक्षा की बात करता हूँ मैं,
धर्म पर मार कर मरता हूँ मैं,
मूर्ख सा बढ़ता रहा जीवन में मैं,
बछड़ा पीता दूध, और रक्षा किया माँ का मैं. (60)
दूसरों की हंसी पर आदमी क्या खूब रोया,
रोने पर दूजो की, हंसी रोक ना पाया,
दुनिया की आस से रोता ही गुज़र गया,
हंसा जब खुद के रोने पे, नासमझ तू दुनिया पाया. (61)
कितने धुन से जिया जग का इंसान
सर कुचले और ख़ूनी राह बनाये इंसान
मंज़िल नहीं हाँफते पहुंचा शुरू पे ही इंसान
जीने की तड़प से मरता बार-बार बेवक़ूफ़ इंसान. (62)
दर्द उठा है जब भी दिल से हुई बातें मेरी,
माँ बाप और संतान बीच हुए फासले कितनी गहरी,
कबूल करना शायद तेरी ही बनी मर्ज़ी,
फ़र्ज़ और धर्म रहा लेकिन, कहना दिल की बातें मेरी. (63)
छोड़ के चल दिए अधूरे अरमानो से भरे दिल को,
ज़िंदा हूँ जग में मैं पीकर इन नैनो से जाम को,
पूरी कर ले यार इस नाचीज़ की एक ही ख्वाहिश को,
कल मिलने का वादा कर, निभा ही दे अपने प्यार को. (64)
दर्द हुआ जब भी तेरी सुंदरता को देखा,
ख़ुदा का मैंने सिर्फ नाइंसाफी ही देखा,
देखू तुझे सदियों तक यही मेरे दिल ने चाहा,
चार लम्हों का जीवन देकर खूब हुआ मज़ाक मेरा. (65)
हसीन चेहरे से नज़र कही हटे ना मेरी,
धड़कता दिल बेलगाम मुस्कान पे तेरी,
माना तुझ सा सुन्दर दुनिया में बनी ना कही,
सुंदरता का पुजारी सदियों से मुझ सा भी होगा नहीं. (66)
कितने धनवानों से दुनिया है खूब बनी,
बहुत मुझ से ज्यादा, थोड़े शायद काम सही,
नफरत ना शिकायत कभी ना किसी से रही,
जीवन के रंगो से खेलू जैसे, मुझ सा कोई धनवान नहीं. (67)
समझा दुनिया की आप हमारे करीब है,
हर दुश्मन हमारा आपका रक़ीब है,
हसीन सपना दुनिया का यह सोच मेरे लिए,
काश एक पल ही आपका नसीब, इस घायल दिल के लिए. (68)
देखा कई सुन्दर रूप इन विशाल सी गलियों में,
बदलते मौसम या कर्कश राहे बसी हर चेहरे और दिल पे,
रुखी जब यह दिल मेरे यार तेरे मासूम चेहरे पे,
आयना ही पाया और देख लिया भगवान उसमे मैं. (69)
धोका दे रहे बुढ़ापे को, जवानी की आस लिए,
रंग कर बाल और होंटो को, नामुमकिन राह चल दिए,
रुका कब यह शारीर के बुझते हुए दिये,
ख्वाइश यही की कब्र तक दिल जवान उड़ता रहे. (70)
छोटी सी ज़िन्दगी के इतने बड़े नफरते क्यों,
चैन की नींद के लिए सोने के कमरे क्यों,
विचित्र रहा इंसान कोख से कब्र तक क्यों,
दिल बसा भगवान् और ढूंढे उसे हर गली क्यों. (71)
सुना है रिश्तों और दोस्तों से ही दुनिया बनी
ज़िन्दगी के तज़ुर्बे ने अफ़सोस कुछ और कही,
जीवन भर का रिश्ता एक इंकार ने तोड़ दिया,
वादा जान का, नशा उतरा तो दोस्त अंजान हो गया. (72)
उम्मीद और नफरत की चक्की में वैद कुचल गया
लाश को भी जान फूंके, भगवान का दर्ज़ा दे दिया,
बची जान तो लूटेरा या व्यापारी कह दिया,
जान निकली तो घर इज़्ज़त को नीलाम कर दिया. (73)
करोडो का रईस हो, या नूर हो सितारों का,
भीक मांगता रंक हो, या राजा हो महलो का
हर पल और हर जन्म में किस तरह से वो मरा,
कुछ तो ज़्यादा पाने की, चाह में कैसे गिरा. (74)
पहली नज़र के प्यार में क्या रही अनोखी अदा,
रूप और सुन्दर चेहरे पर जान हुआ कैसे फ़िदा,
वक़्त बदला रूप और दिल का असली रंग बिखरा,
बेचैन तड़पा यह दिल, मोह जब हुई जुदा. (75)
चोटी पे पहुँच सके, अफ़सोस है जूनून सबका,
मेहनत कई बार ज़िन्दगी में, रंग कहां ला सका,
अव्वल लोगो से ही नहीं बनी, हर राह दुनिया का,
परबत की हर ऊँचाई दिखाये, कुछ तो हसीन नज़राना. (76)
कितनी सूनी है चोटी पे ज़िन्दगी मेरे यार,
दर्द देते हुए आज दर्द में डूबा हूँ बेशुमार,
पतली चोटी पर खड़ा डर से, ढूँढू मैं प्यार,
दौड़ा चढ़ती राहों पे, काश साथियों को देखता एक बार. (77)
सुख और चैन से है भागा दूर
जात, प्रांत, और धर्म से है आग बबूल,
लड़ लिया दुश्मनो से हर पल खूब,
गुस्सा थूंक, जी ले तू, प्यार में बस आज से डूब. (78)
रिश्ते टूटे, बंधन छूटे, प्यार का कोई नाम नहीं,
दुनिया डूबी यंत्रो में, किसी को भी वक़्त नहीं,
माँ-बाप बसे है दिल और घर से दूर कही,
नाम पे उनके दिवस मनाये, सन्देश भेज दुनिया को सही. (79)
प्यार से शुरू हुआ, दर्द दे दुनिया में गिरा,
ज़िन्दगी नफरत से सींचा, प्यार को भटका फिरा,
जहां को खत्म किया, रोया जब वह खुद मरा,
इंसान तेरी खूब अदा, बदल जा अब तो ज़रा. (80)
देर आयने में देख के, ज़ुल्फो को ऐसे सवारों ना,
क़यामत न हो जाये इंतज़ार में, नाचीज़ को मारो ना,
बिंदिया लगा के माथे पे, मुस्कुराना मंद ना इतना तू,
लब्ज़ हमें भी छोड़ दो, तारीफ में आपकी कुछ कहने को. (81)
पूछा सवाल दुनिया ने, क्या दस्तूर है जीने का,
भगवान शायद अभी दूर सही, जीने का अंदाज़ यही रहा,
सूरज उठा तो मान ले बात, आज का दिन सबसे खूब रहा,
सूरज डूबा तो कह दे यार, सुन्दर मुझ सा ना कोई रहा. (82)
मौत से किसी को ना फ़र्क़ हुआ
जन्म तो क्षणिक दो लोग का ख़ुशी रहा,
हर संत-अवतार फूल सा महक कर छूटा,
दुनिया वही, तेरा बदलना जीने का अर्थ रहा. (83)
दुनिया तड़पे व्याकुल क्यों, विशाल सी नफ़रतो से,
दर्द बसा सब में क्यों, बिन जवाब के सवाल से,
गैर बन के जहां से क्यों, दिल जलाया शान से,
हर दर्द की दवा एक भूला क्यों, जी ले बस प्यार से. (84)
मरना संसार में हर प्राणी को एक दिन,
तू क्या, ज़मीन आसमान को राख होना एक दिन,
मोह और नफरत से तड़पे क्यों तू हर पल,
अफ़सोस ही मौत के पहले मरता इंसान हर दिन. (85)
खेल ज़िन्दगी दो दिन का, मतलब कहां जन्म और मौत का,
अर्थ ढूंढते जीवन का, निकले प्राण हर जीवी का,
डूंडा प्यार पगला सा, पहन अजीब सा रंगीन चश्मा,
दिमाग वक्र कैसे बदला, प्यार सिवा सब कुछ है देखा. (86)
दर्द ही छुपा हुआ कई बार मुस्कान में,
प्यार ही बसा रहा कितने से इंकार में,
खा ना दोखा देख कर इंसान के रूप-चेहरे
वक़्त थोड़ा ले ज़रूर इंसान की पहचान में. (87)
घर प्रति हर फ़र्ज़ किया मैंने पूरा,
देखा दुनिया, कोई चाह न रहा अधूरा,
नहीं कोई लक्ष्य बचा दुनिया में सोचा मैं,
ज़िंदा है तू अभी, तेरा काम तो रहा आधा अधूरा. (88)
धूप कभी और छाँव कभी, ज़िन्दगी के खेल है,
दोस्त कभी और दुश्मन कभी, इंसान के नासमझ रंग है,
ढूंढ रहा हैं काश मोती, तूफानी समुद्र जहान है,
मुड़ के मन में झाँक ले, मणियों का तो ढेरा है. (89)
उड़ी झुल्फ तेरी जब, हवा के झोंको से,
दिल मेरा मचल गया, हसीन अदा देख के,
पलक उठी और गिरी नज़र जब इस नाचीज़ पे,
दिल चाहा की बिखर ही जाऊँ, तेरे कदमो के तले. (90)
कर के छोटा तुझको, हो गया मैं कैसे बड़ा,
आज मुझको तुच्छ करके, और कोई आगे चला,
आँख उठा के इज़्ज़त दी, पर ना मुझे ही नीचे देखा,
बड़प्पन असली यही रहा, उनसे बड़ा शायद ही रहा (91)
मैं ही क्यों सोच कर, मुश्किलों से जब मिला,
मौत के पहले ही मैं, मौत से मिलता चला,
हर पल जीने का, मन्त्र शायद एक रहा,
पहले से था क्यों नहीं, और मुश्किलों से जा भिड़ा. (92)
ऐसे भी कुछ लोग यहाँ, रौशनी को अँधेरा माना,
ख़ुशी मिली तो रूठा ऐसा, दर्द क्या अब दूर रहा,
दूर रहले इन से दोस्त, तुझे यहाँ है ज़िंदा रहना,
ज़िन्दगी जिसने मौत का, सिर्फ राह और नक्शा समझा.
सुन ले बात उन लोगों की, जो रात हुई तो दीप जलाया,
दुःख एक काँटा सही, फूलों का इशारा समझा,
जीना है तो दोस्त बना ऐसे मस्तानो को सदा,
जीते हर पल ऐसे यहाँ, की मौत भी उनसे मांगे पनाह. (93)
देश का भी कैसा अजीब हाल हो गया,
अकेला बड़ा आगे, टोली को बर्बाद किया,
घर में पूजा और मंदिर की बात चला,
बाहर जा चोरो के महफ़िल में झूम गया. (94)
तू कम मैं ज़्यादा का जूनून क्या खूब चला,
सुख कितने आये मगर, हर रिश्ता पर कैसे बिखरा,
तू ही सब, मैं नहीं कुछ, जब जीवन में जान सका,
दुनिया क्या, भगवान भी चलकर बाहों में आ गिरा. (95)
चलता ही चल मस्त राहों पे राही,
मंज़िल की चिंता क्यों, वो तो बसा है यहीं,
खुद के बना रस्ते अपनी ही शान से,
हर कदम बने, एक नयी मंज़िल की कहानी. (96)
इंसानो की दुनिया है, गलती तो मुझसे होनी है,
चाहो लाख हसाने की, नाराज़ तो कोई होना है,
भगवान शायद दूर रहा, या दिल के आँगन में छिपा,
उनकी ओर उठा कदम, जब हर इंसान को तू माफ़ किया. (97)
बातें रंगहीन और दिल हुआ घायल,
जेब हुआ हल्का, और जवानी गया ढल,
किसी ने गर हाथ थामा, साथ दिया हर पल,
एक रिश्ता भी ऐसे मिला, जीवन तेरा हुआ सफल. (98)
दुत्कारा जानवरों को, इंसानियत का नाम हुआ,
कैसे इंसान बड़ा आगे, जानवर को बदनाम किया,
भूक ही अपनी मिटाने को, जानवर दूजे को मार दिया,
कैसी इंसान की अस्पष्ट प्यास, दुनिया क्या अपनों को भी जला दिया. (99)
ज़रुरत कभी की ना दस्तक रही
दावत की ना कारण रही
राहो पर तेरे सदा, फूलों की इच्छा रही
व्यापार बाकी सब, मुश्किल ऐसे दोस्त सही. (100)
दूर समुन्दर की लहरे देखा, बैठा मायूस तट पे,
बसा हुआ है शायद ख़ुशी नए देश या जन्म में
एक हवा का झोंका आया साफ़ हुआ दिल के कोहरे
ख़ुशी छुपा इधर और अभी, नहीं सौ जन्मों की कोशिश में. (101)
जन्म का कोई वजह नहीं, मक़सद नहीं कुछ जीने का,
मौत एक दिन आनी है, दुनिया को क्या कुछ फरक पड़ा,
दुनिया माना जब सच्चा तू, हर काम तो तेरा भोज हुआ,
दौलत दुनिया नकली तो, हर काम प्यारा खेल रहा. (102)
बेहाल थे दुनिया में, चली कितनी मुसीबतें,
दिल हो गया बेचैन, अजीब शैतानो के बीच में,
ऐसे में क्या प्यार से हाल हमारा पूछ लिए,
हज़ार फूलों के रंग से, हाल कितने खूब हो गए. (103)
दोस्त और रिश्तों से दुनिया है चले
सुना यह बात मैं ज़माने से
दस्तक बिना चला आऊ घर में
ऐसे तो अपने, थोड़े और मुश्किल ही रहे. (104)
सच्ची मेहनत से दुनिया का हर रंग से रंग जाऊ
ना आस रहे मेरी दौलत की, बच्चो को माहिर ऐसे बनाऊ
बेसहारो को सब कुछ छोड़, दुनिया में फिर ना आऊ
कर्म और धर्म का इससे बेहतर और नक्शा क्या बनाऊ. (105)
नफरत के शोले बिखरे कितने खूब यहां,
साये तक झगड़े एक दूजे से बिन कारण यहां,
डर और दर्द है ज़िन्दगी, प्यार दिखता ही कहां,
बार बार दुनिया में आने की, आस तो लेकिन बुझी कहां. (106)
खूब छात्र है यहाँ लड़े, बचपन खोया पढ़ने में,
दौलत के सिर्फ पतले रस्ते, सिखा दिया है विद्या ने,
जीवन कौशल की बातें पक्के, बने इंसान इनसे सच्चे,
रंग अनमोल ये विद्या के, पूर्ण विकास का निर्माण करे. (107)
हाल देखो देश के, क्या खूब बेहाल हो गया,
भूल के हर एक मंदिर को, दौलत बना भगवान नया,
कपडे उतार नौटंकी तारे, बन गए देश के अजीब प्रेरणा,
सैनिक के बर्फीले मौत पे, आँख ना हुआ किंचित भीगा. (108)
अचंभा रह जाता देख, दो रंगों का पुलिस जाल,
ज़रुरत जब पड़ी मेरी, बन जाता हूँ भगवान.
भूल के भी पहुंचा, छोटे से काम से उनके द्वार,
तुरंत ही मुझे बना दिया, चोरो का चोर महान. (109)
जीत लिया है शायद तूने बाज़ी को,
या जीता है दुनिया के हर खेल को,
एक ही रूप दिखा तेरा, दुनिया के दो लोगों को,
माँ रही एक, और दूजा बचपन के दोस्त को. (110)
पलक झपका तो ज़िन्दगी के पल आधे हो गये,
पलक झपका तो रिश्ते कितने ही उजड़ गये,
डर से बैठा हूँ, पलको को थामे हुए,
मूर्ख पर हँसता लेकिन, वक़्त की बेरेहम लहरें. (111)
मंदिर, मंदिर घूमा, पाने उनके दर्शन को,
हर आश्रम में जा कर बैठा, पाने दिल के चैन को,
पुस्तक प्रचारक में ढूँढा, सच की बातें गहरी को,
व्यर्थ हुआ सब जब बैठा चुप, तोड़ के हर एक सोच को. (112)
हुस्न की क्या बात चली, इश्क़ का क्या नाम हुआ,
दर्द की हुई बदनामी, इज़्ज़त क्या मशहूर हुआ,
कोख से कब्र तक, किस तरह भटका हुआ
बेकार की बातों से, सच से कोसो दूर रहा. (113)
जहा से शुरू हुआ, वही तो दौड़ के जाना है
मंज़िल की बाहें तो, हर पल ही घेरा है
समझना है आसान शायद, सदियो का संदेसा है,
छोड़ना इस दिमाग को, लेकिन जन्मो का परीक्षा है. (114)
हर ख़ुशी को चूम ले, दोस्त जीता तो झूम ले,
दुश्मन को भूल के, नफरत को दूर छोड़ दे,
ज़िन्दगी है छोटी ये, क्या फ़र्क़ हुआ है अंत में,
कब और किसका बुलावा है, खुल के हर पल जी ही ले. (115)
क्या खूब बढ़ा है आधुनिक चिकित्सा,
पुरानी बातें बन गए है आज नया,
माँ का दूध सदियो से, प्राणी हर का नींव रहा,
स्थन के दूध का दिवस बना, अव्वल इसे बना दिया. (116)
मशहूरी के ढूंढते रस्ते, खड़ा इंसान मजबूरी में,
दांव पर दांव लगा के, ख़ुशी को इंसान कैसे तड़पे,
अजीब की ख़ुशी रही सिर्फ, बिन ख्वाब के नींदों में,
भूला हर धर्म और कर्म, उन्ही नींद की बाहों में. (117)
देश सभी का, किसीको मिटाना कभी ना इसका धर्म रहा,
अफ़सोस यह बात उठाया की भारत भी हर देश सा बदल गया,
पांच हज़ार साल की परंपरा और इतिहास यही रहा,
शरण दिया हर मज़हब और मजबूर को, गला भी जब कट गया. (118)
बड़ा तो वही है यारो जिसने तुझे छोटा ना किया,
देखा जिसे नज़र उठा के, उसकी नज़र ना नीचे किया,
हर हार और जीत को तेरी, अपना ही महसूस किया,
मुश्किल ऐसे लोग, चंद को ही भगवन ऐसा रूप दिया. (119)
शादी के हमारे बाईस साल बीत गए,
गम ओर ख़ुशी, उतार चढ़ाव देखे इन राहों में कई,
धूप छाँव के खेल में कई बार शायद नाराज़ हुए,
एक पल भी ना लेकिन, रिश्ते में गलती का एहसास हुई. (120)
सब कुछ है ज़रूरी, हर चीज़ की कीमत रही,
ज़िन्दगी हर पल सही, हर दोस्त का जज़्बात सही,
रिश्ते सभी सच रही, काम ना कोई फ़िज़ूल रही,
समझ पर ज़ोर से, तेरा होना दुनिया को कुछ फ़र्क़ नहीं. (121)
रस्ते ढूंढ रहा मैं सदियों से, सच को तड़पा हूँ सदा,
एक राह झूमा अकेला, तो दूजा सबके गले लगा,
कभी मंदिर में जा कर बैठा, कभी काम में उलझ गया,
अंदर जब तक मुड़ा न मैं, जन्मो तक भटका ही रहा. (122)
वादे तोड़े है कई शायद, बुरा तो नहीं हूँ मैं,
भूला कई बाते अनजाने में, व्यस्त था दुनिया में मैं,
बंदा इस लायक नहीं, एहसान मुझ पर कर दे तू,
ख़ुदा ही बन जा यार और नाचीज़ को माफ़ कर दे तू. (123)
चलते हुए राहो में कितने मोड़ मिल गए,
दोस्त चले थे साथ और अचानक बिछड़ गए,
बिछड़े यारो की यादें ज़रूर दिल को तरसा दिए,
नए दोस्तों ने पर हाथ थामा, कुछ आंसू तो पोंछ दिए. (124)
कीमत की बाते चली तो दिल मायूस हुआ बेशुमार,
कांटे भरी दुनिया से, दो फूल चुराके लाया आज,
कबूल ही करले नाचीज़ के तोहफे को मेरे यार,
सोना चांदी तो नहीं, कीमत है सिर्फ इसका पूरा प्यार. (125)
बूढा हमें कहकर हमारी तो तौहीन हो चली,
चेहरे की लकीरे, हाथ की ताक़त तो धोका ही रही,
सुन ले बातों को, या पढ़ ले कलम को हमारी,
कसम ख़ुदा की, शर्मा ही जायेगी तेरी फूटी जवानी. (126)
मेरे कल के ख्वाब तेरे आज के जीत रहे,
तेरी कल की याद, मेरे आज के दर्द रहे,
वक़्त का यह रंग है, माया को कौन समझे,
अतीत, आज और भविष्य, सिर्फ इस पल के साये रहे. (127)
वो सफर ही क्या जो झुण्ड में सबके साथ चले,
वो दीप क्या जो मंदिर में हज़ारो के साथ जले,
बना खुद के राहे ऐसे नेक और इतने गहरे,
झुण्ड तेरे रोशन से, तेरे पीछे ही बढ़ता चले. (128)
चाह से है लब्ज़ उठा, लब्ज़ से दुनिया बना,
शोर जितना है उठा, जन्म हज़ार फंसता रहा,
दिल की भाषा पर मौन है, चाह तो टूटा यहाँ,
चाह-लब्ज़ जब ख़त्म हुआ, न जन्म या जहां रहा. (129)
स्वप्न सा जीवन चले मस्त ऐसे झूम के,
सोचा क्यों धर्म की बाते कोशिश को छोड़ के,
गहरे नींद का एहसास आँख खुले भी होने दे,
आना है मोक्ष एक दिन, संत के ही देन से. (130)
खुश ही था ज़िन्दगी में कितना यारो,
कोई नाम नहीं था गम का कही यारो,
हर सुबह थी एक नयी खुशबू का एहसास प्यारो,
नज़र लग गयी खुदा की और शादी हो गयी यारो. (131)
क्यों लोभ दिया मुझको सोने के दो सिक्को से
क्यों डरा रहा मुझको रिष्तें बिखरने की धमकी से,
मोह नहीं मुझको दुनिया के बेशुमार खिलोनो से
ब्रह्माण्ड का हर भेंट मिला इसी दिल के आँगन से. (132)
चला दुनिया में अकेला, कितने ही रास्तो से वाकिफ़ रहा,
बर्फीले पहाड़ो पर या जलते रेगिस्तान में सफर करता चला,
सच को ढूंढता भटका मगर, समझा ना बात सदा,
दिमाग से दिल का रास्ता सबसे मुश्किल पर नेक रहा. (133)
सदियों से कहता आ रहा बच्चो से बाप,
सुन ले मेरी बात और सुन्दर सी राहो को नाप,
दूर जाकर मुड़कर कहा, सुनता काश पहले ही तेरी बात,
बाप कहा सदा लेकिन देर ना हुई, बाकी है अभी रात. (134)
चला खूब यह देश और दुनिया यंत्रो के भीड़ से,
विज्ञान दिए है भेंट ऐसे, सांस भी ना ले वक़्त से,
रिश्ते हज़ारो बना कर, बाते दुनिया से भरपूर करे,
कफ़न के पहले ही, अपनों से ज़िन्दगी कोसो दूर रहे. (135)
घूमता है क्यों दर्द लेकर हर तरह के वैद्य के पास,
अजीब है चिकित्सा दोस्त, रोगी बना पहलवान आज,
जाम उठा इन हाथो से, उतार गले से दो घूँट मार,
हर दर्द की एक ही दवा, समझेगा निश्चित मेरे यार. (136)
चलते रहो राहो में, झूम के तुम,
मस्ती में गाते धुन, कांटो से फूलो को चुन,
साथी तो मिलते और बिछड़ते, मत कर तू गम,
मंज़िल की चिंता क्यों, सफर का मज़ा ले हरदम. (137)
कोख से निकला जब, मौत ही सिर्फ कानून है,
हर तरह का नियम तो, मन का कोई जूनून है,
कायदे बने टूटने को, गंभीर ना ले जीवन के राहे,
दर्द हुआ गर ना किसीको, दो नियम भी कभी तोड़ दे. (138)
रिश्ते बिखरे है दूर यहाँ, पथ्थर दिल बस सारे है,
दुनिया के बाज़ारो में यहाँ, प्यार की कीमत तो भूले है,
बन्दूक की ताक़त पे अँधा होकर, प्यार का दर्ज़ा बेबस है,
ख़ुदा भी पिघला प्यार के बल से, इंसान तो फिर क्या चीज़ है. (139)
व्यर्थ नहीं है जीवन कोई, हर एक की कोई कहानी है,
ध्यान लगा के देखो ज़रा, हर पथ्थर भी जज़बाती है,
अभिनेता शायद प्रेरणा रहा, नायक कभी खोया जवानी है,
फल और फूल दे पेड़ ज़रूर, कीचड़ में कमल भी सीख है. (140)
कुछ दोस्त यहाँ पर ऐसे, जो सदा साथ ही चलते है,
नज़रो से कोसो दूर सही, दिल में सदा ही रहते है,
पर ऐसे भी कुछ दोस्त यहाँ, जो बाते प्यारी करते है,
हम घर आने की बात करे, वह शहर छोड़ के भागे है. (141)
जन्म का कारण बता, मौत का ही खौफ है,
हर दर्द लड़ा जोश से, हर दर्द से रूठा पड़ा,
है संत वचन एक ही, ना जन्म था, ना मौत है,
बात जब समझ सका, हर दर्द तो बस खेल है. (142)
दुनिया को गले लगा, अपना बना दे सबको यार,
बेहतर नहीं शायद रस्ता, दर्द छूटेगा यह पहचान,
सबसे ज्यादा दर्द हुआ जब, कुछ लोगो से तेरा प्यार,
हाथ बढ़ाया तू अपनों को, और गैर थाम के लिया छलांग. (143)
हर रूप का मन्त्र मिला, उम्र जब बढ़ता गया,
दवा रंग बदला कभी, नए पकवानों का दौर चला,
हमदर्दो की चाह से, वक़्त से लड़ता रहा,
प्यार से दो बात करले, कुछ और ना मेरी मांग रहा. (144)
पूछा आज किसीने, मेरी जवानी का सुन्दर राज़,
किस तरकीब से दूर रखा, बुढ़ापे की टूटी साज़,
जोड़ हमेशा मेरे यार, मेरी उम्र को पच्चीस साल,
तभी बनूँगा मैं बूढ़ा, और रंग लूँगा मेरा बाल. (145)
खूब छाया है चेहरे पर जवानी का नूर,
शरमाया देख कर हमें, बाग़ के निखरते फूल,
नज़र डाले हम पर दुनिया, पर हमने तो फेंका धूल,
दस्तक देता ही रहा बुढ़ापा, पर दोस्तों ने रखा उसे दूर. (146)
अच्छा है जहान में, तो बुरे का भी धूप है,
राम का है रूप तो, रावण रहा ना दूर है,
कांटे और फूल का, कुछ तो यह बंदिश ही है,
मुक्त हुआ जब इनसे तू, प्यार का ही रूप है. (147)
दुश्मन को भूल के सदा, दोस्त लेके झूम जा,
परिवार हो तो वक़्त दे, निर्भरो को दे दया,
ना मन्त्र और जीने का, लक्ष्य है बस मोक्ष का,
ना जन्म था, नो मौत है, ज़िन्दगी तो खेल जा. (148)
घर छोटा कहा दोस्त ने, गुज़रा जब उसके शहर से,
बाग है उजाड़ से, फूल भी मुश्किल भेंट में,
दिल में हो जगह तो यार, खोली भी महल बने,
प्यार हो जहाँ पे दोस्त, धूल मोती का रूप ले. (149)
बातो का बुरा ना लगा, बाप ही रहा हूँ मैं,
पागलपन दिखे शायद तुझे, प्यार का ही रूप है,
दर्द हो तुझको, ऐसा तो कभी सोचा ना मैं,
तेरे जन्म से मेरे अंत तक, तुझसे सिर्फ प्यार है. (150)
टूटा खिलौना तो गम न हुआ कभी
टूटना है एक दिन इंसान को भी कभी,
हँसा तू लेकिन खिलोने के टूटने पर जभी,
रिश्ता फूटा कांच सा, गम हुआ सिर्फ तभी. (151)
गज़ब आदमी का उड़ान रहा, मन देख के हैरान हुआ,
धन तिजोरी में बढ़ता गया, रोज का खाना पर कम किया,
जीवन लंबा होता रहा, प्यार का नाम लेकिन गायब हुआ,
अपनी रक्षा को ताबीज़ पहना, पर दुनिया को नीलाम किया. (152)
कितना अजीब रहा है इंसान की जादू उड़ान,
उम्र बढ़ता रहा कोशिश में, की बने वो धनवान,
लंबे जीवन की आस में रहा कैसे परेशान,
ताबीज़ जुड़े रोज और घटता गया खाने में पकवान. (153)
जीने का तो मोह नहीं पर मरने का भी चाह नहीं,
दुनिया में गर आया हूँ, कुछ कर्म भी तो है सही,
कल, आज, कल, दुनिया है चली, मैं हूँ या नहीं,
किसीको ना फ़र्क़ हुआ, मेरा कर्म मेरा ही धर्म रही. (154)
सुबह किसी का हुआ मौत, शाम जन्म का मिला खबर,
सुबह को आंसू बिखर चले, शाम उठी हंसी की लहर,
जब अँधेरा रात का घेरे, नींद में सब कुछ हो गया चूर,
ज़िन्दगी है चलता बस, चक्र थमने की बात बड़ी दूर. (155)
भारत गया चाँद पे यारो, गाड़ियां चली कितनी शानदार,
लंबी इमारते खड़ी हुई, चमकते घरो का खूब निर्माण,
देखो और रो ही ले, नेता अधिकारी का भ्रष्ट कमाल,
ढंग का रस्ता एक न बना, टूटा कांच सा बस सौ सौ बार. (156)
हैरान क्यों सवालो का जवाब ढूंढते हुए,
रहने है सवाल कई, बिन किसी जवाब के,
जूनून बस दिमाग का, जवाब भी बदलके सवाल हुए,
सीधी सी राहे यह, सवालो से ज़िन्दगी ना मार दे. (157)
भूल सदा इस नादान ने किया
तेरी बेवफाई में तड़पता ही रहा,
पर अफ़सोस, प्यार तुझसे इतना किया,
की हर गुनाह तेरा, मैंने माफ़ किया. (158)
मूर्ख ही रहा इंसान से इंसान का प्यार,
आसमान कटोरी में भरा, जान छोड़ा जब हुआ इनकार,
नहीं परवाह मुझे गर तूने है किया इनकार,
एक नहीं मैंने तो दुनिया से किया है प्यार. (159)
हुस्न तेरा क्या नाम हुआ, इश्क़ क्या मशहूर हुआ,
मुमताज़ सा तो हुस्न कहाँ, ताज़ बनादू बल है कहाँ,
खामोश रहा और खुशियां बांटा, प्यार तो लेकिन वही रहा,
राज प्यार इतिहास बना, हमरे प्यार से दुनिया ही चला. (160)
दोस्त उड़ता चला, ज़मीन पर छूटा अकेला मैं,
हाथ हमारे भी थके हुए, उड़ान के बुनियादो में,
मुढ कर काश देख लेता, खड़ा हूँ खामोश मैं,
उफ़ ना उठी होंटो से, लगी दोस्ती की कसम जो मुझ पे. (161)
कर्म की बातों को, क्या है कोई समझ सका,
अच्छे बुरे के मेल से, संसार का तो चक्र चला,
जाना अतीत इनसे, रूप और नाम जहाँ पिगल चुका,
सच का जब द्वार पहुंचा, अच्छा ही होना तेरा हर कर्म भला. (162)
बेरहम सा दौड़ चला, वक़्त की बहती धार,
रुका नहीं कागज़ के पन्नो से, समुन्दर की रफ़्तार,
मायूस ही हो सका, चला यूं सितम की तलवार,
थोड़ा रुका और भरा सांस, आधी ज़िन्दगी हो गया गुज़ार. (163)
दर्द है छुपा हर इंसान के सीने में
धोका ना रहे रंग, रूप, और शोहरत में
धर्म और कर्म है सभी का, दुनिया के खेल में
हर एक की कीमत रही, इज़्ज़त रहे हर मेल में. (164)
पड़ता ही चला हर पुस्तक को, मिला नहीं भगवान् मुझ को,
पन्ने, पन्ने छान के बैठा, काश दिखता इस बन्दे को,
जब बंध किया हर पुस्तक को, और बंध दिमाग के ताले को,
जुदा नहीं था उनसे मैं, महसूस किया जब धड़कन को. (165)
हालात बुरी संसार का यारो, देश का भी कुछ कम नहीं
कोशिश सदा है इंसानो की, गले लगे इक दूजे की,
नेता खींचा उल्टा दस, एक कदम जो आगे ली,
नफरत के सौदागर नेता, दुनिया डूबे इनसे सही. (166)
इंसान ही सिर्फ तू ठहरा है, गलतियां तुझसे दूर नहीं,
ठहरा दुनिया भी अपनी जगह, अपने भी और पराये कई
किसी ने तुझ को माफ़ किया, किसी ने शायद कभी नहीं,
माफ़ ना जब तक खुद को किया, रात की तेरी सुबह नहीं. (167)
शमा-परवाने की कहानी तो अब है पुरानी,
जनता और नेता की छिड़ गयी नयी कहानी,
अजीब रहा प्यार देखो, की नेता करे है सिर्फ बर्बादी,
उनको ही चुना पर लेकिन, पागलपन जनता पे छायी. (168)
हँसने की गलती की और आंसू ही निकल पड़ी,
नज़र इस दुनिया की, क्या बेरहम सी मुझको लगी,
रोया पर जब फूट के मैं, क्या ज़ोर से हंसी दुनिया,
अजब संसार की यारों, क्या ज़ालिम रीत रही. (169)
कुछ तो करने की चाह में, कदम बेचैन बढ़ता गया,
दुनिया पे हर दिन हर पल, जान छिड़कता ही गया,
खूब आगे चल कर, पीछे जब मुड़ कर देखा,
तनिक ना कुछ बदला हुआ, दुनिया जगह पे अपनी खड़ा. (170)
दुनिया की बातों को दिमाग से विश्लेष किया,
मैल से मैल को परखा, सिर्फ मैल का ही नाम रहा,
अवतार की बस बात रही, की चाह है तो दुनिया रहा,
जब चाह छूटा, दिमाग भी फूटा, ब्रह्माण्ड सारा तेरा रहा. (171)
दो टुकड़ो की धरती पर, गला इंसान का काट दिया,
खून की दौड़े चंचल लहरें, पानी को भी अब रंग दिया,
डूबेगा दुनिया को लेकर, नफरत से हैरान किया,
गायब होगा जब इंसान, तभी चैन से जग है जिया. (172)
ढूँढा भगवान् और काट चला दुनिया,
ढोंग का रूप इंसान ने लिया,
बेईमानी का हर रंग लिया,
और ख़ुदा का नाम बदनाम किया. (173)
हर जीवन की रची कहानी, बचपन रही सिर्फ नादानी
अहंकार से भरी जवानी, बूढा हुआ तो गम है साथी,
चाह रही कुछ करने की, शुरू किया पर रात ढली,
इस पल में तो जीना भूला, सपने और यादो से तड़प रही,
भगवन घेरा हर पल तो, सीधी बात तो भूल चुकी,
जीवन चक्र का यह नक़ाब, ख़ुशी सदा से छुपा रही,
हर सांस ख़ुशी की रूप रही, भगवन नहीं था जुदा कभी.
हर सांस ख़ुशी की रूप रही, भगवन नहीं था जुदा कभी. (174)
ज़िन्दगी में क्या कभी कुछ, हल्का सा उद्धेश्य है,
ना ही ज़िन्दगी से कोई, कुछ किसी को काम है,
हर रूप की साधन रही, कर्म चक्र की फांस है,
फूलो में है तन बसी, कांटे हज़ार इस मन में है. (175)
आखिर तो इंसान हूँ, दाग तो मुझमे लाख है,
रूठा एक दिन इश्क़ ऐसे, छूटा अकेला नादान मैं
दर्द है पर हँसता क्यों, प्यार पे मेरे कई सवाल है,
इंसान और दर्द ही झूट है, सच्चा प्यार कभी न खोट है. (176)
अनोखी दुनिया की अदा क्या खूब रही,
पूछा नहीं सवाल और जवाब देती गयी,
बताया सिर्फ हाल हमने, राह चलने की सीख दे दी,
हाथ पर माँगा जब, थामने की बात तो दूर ही रही. (177)
रात छायी तो सुन्दर सपनो की आस रही,
सपनो से शुरू हुई, सुबह की किरण पहली
दर्द इतना सपनो का पल पल तड़पाती रही,
आँख खोल कर ज़िन्दगी जीना तो दूर हुई. (178)
ज़ुनून क्या रहा इश्क़ के नाम पर जवानी
चेहरे का तिल से रचाया प्यार की नयी कहानी,
प्यार की पहचान इतनी ही रही दीवानी,
दिल की बात जाना जब, मज़ाक जवानी की हर कहानी. (179)
नियमो का भी कुछ अनोखी दास्तां हो गयी,
कुछ उनसे रची और ढेर हमसे भी बन गयी,
नियम हर तोडा इंसान ने, ख़ुदा का नियम यह पक्की रही,
राजा और रंक मिलना है धूल में, एक नियम तो सच्ची रही. (180)
दौड़ा नफरत दुनिया में, रुकने का कोई नाम नहीं
भरा इतिहास का हर पन्ना नफरत के कलम से सही,
खुद को थोड़ा छोड़ दिया, हर किसी से शिकवा रही,
प्यार का सूरज तो गल गया, बिन सुबह की रात चली. (181)
जलता है क्यों हर पल, कुछ करने की चाह में,
तड़पा है क्यों हर पल, सपनो की आस में,
जीना ही छोड़ा क्यों, इस पल के सांस में,
मरता है क्यों हर पल, जीने की इस राह में. (182)
दुनिया से कभी ना मुझको दर्द रहा,
एक नहीं मैंने तो सभी से प्यार किया,
अकेला था सफर तो थोड़ा भी ना गम हुआ,
सबसे अच्छा दोस्त मेरा, मैं ही खुद हमेशा रहा. (183)
वक़्त की इस जाल को, क्या कोई समझ सका,
क्या जवानी, क्या दीवानी, हुस्न पे तो जाँ दिया,
प्यार या इंसान झूठा, कौन समझा जब वक़्त पलटा,
हुस्न ही जब ढल गया, द्वेष से बस जाँ लिया. (184)
बाते हज़ार सुनाने को यह दिल तरस गया,
कोई बात समझा नहीं, कोई सुनते ही दौड़ चला,
मायूस बैठा चुप, अपनी बातों को सुनता मैं अकेला,
शायर क्या बना, बुढापे का सूनापन समझता ही चला. (185)
खुश नसीब हूँ मैं, की मिले कितने दोस्त मुझे आज,
कोई मुश्किल नहीं जिसमे, मिला न मुझको उनका हाथ,
रहा कोई भी दर्द, दवा हमेशा दिया दिन और रात,
पर कविता क्या सुनायी, मैदान में छूटा अकेला आज. (186)
क्या दौड़ रही इस जीवन की, रुकने का कोई नाम नहीं,
रिश्ता दोस्त राहो में आये, मुँह छुपा कर भाग रही,
अपनों का तो बहाना था, वक़्त सदा कही और सही,
ना दोस्त बचा ना रिश्ता, दौड़ रुकी आंसू न बही. (187)
क्यों रोता है तू, देख कर दूजे की किस्मत,
इंसान है बना तू, कुछ तो रही तेरी कीमत,
रंग है हर रूप में, सब कुछ नहीं यहाँ दौलत,
चमकेगा हीरा ज़रूर, औज़ार सिर्फ तेरी मेहनत. (188)
कुछ भी ना चाहा तो सब कुछ ही मिल गया
कुछ भी ना करना तो सब करना हो गया
बात यह समझा जब, अर्थ जीवन का पूरा हुआ
रोशन ही तू, अंधेरो से ढक कर रोता ही गया. (189)
इनकार सिवा तो कुछ ना मिला, आस लेकिन कम ना हुआ,
जीवन में कितना दर्द मिला, जीने की चाह तो वही रहा,
धुंदला सा सही पर कुछ तो रहा, प्यार में कोई बेतोड़ अदा,
दर्द इनकार से गिरता रहा, प्यार का खेल तो चलता गया. (190)
दो दिनों की जवानी, छोटी सी कहानी,
दर्द से शुरू हुई, कांटो से राह गुज़ारी
बात सदियो से, पर रही सिर्फ नादानी,
कुछ ही फूल खिली, नफरत से वो भी उजाड़ी. (191)
दर्द रही कुछ लोगो की, उम्र से बेचैन जंग रही,
बूढा होना एक दिन यारो, दुनिया की जो रीत रही,
हर पल चला है कब्र को, सदियों की यह सीख रही,
इनकार किया तो पागल वो, कबूल से दिल में चैन रही. (192)
अकेला दुनिया में मैं नहीं, जीवन जिसका साधारण है,
कोशिश रही है कितनी भी, जीत कभी ना होनी है,
उदास ना होना किस्मत से, दौड़ में एक ही जीता है,
खुशनसीब कोई छोटी पे, तालियों की हमारी भी कीमत है. (193)
इंसानो का दर्द रहा, कशिश रही इन राहों में,
कहानी तेरी छोटा सा, बदला क्या कुछ जहान में,
नासमझ कितना रहा, सब समझने की आस में,
पाया सब अभी और यहाँ, हर राह तो चमका झूट में. (194)
गलतियों से भरी ज़िन्दगी, गलतियों से हम चले,
दर्द मैंने थोड़े दिए, कुछ दर्द तो मुझको मिले,
माफ़ करना और होना हर बार मुमकिन तो नहीं,
हर कोई तो माँ नहीं जो झट से माफ़ी देती रहे. (195)
दूंड़ता हूँ भगवान् को, हर किसी भी राह में,
हर गली में मैं फिरू, सच एक दोस्त की चाह में,
शरण को मिले गुरु, हाथ थामे जो ले चले,
आज अचानकक सब मिले, देखा जब खुदको आयने में. (196)
गंभीर ना ले इस जीवन को, काम चला है चलने दो,
कुछ पल हो यारो के संग, लूट ज़िन्दगी के फूलो को,
गुज़रे पल कहां लौटे है, काम की चक्की न रुकी पर जो,
रुक कर कभी हंस ले ज़रा, ज़िन्दगी पूरी है रोने को. (197)
काबिल सिर्फ ताक़त ही, जो किसी को माफ़ किया,
दुनिया में यह बात चली, मुझसा निर्बल तो दुखी हुआ,
दिमाग कभी हाथो से ज्यादा, इस बात की जब समझ हुआ,
ख़ुशी से मैं बह गया, जब हर नादान को मैंने माफ़ किया. (198)
रुका कभी ना वक़्त है, दर्द भी सदा से है,
कर्म तेरा हर व्यर्थ है, तुझसे ना यह जहान है,
ना अधूरा कुछ तेरे बिन, खिला सदा तो बाग़ है,
कर्म तेरा ही धर्म है, जहान को कुछ न फ़र्क़ है.
ख़ुशी से बस तू कर्म कर, और कुछ ना धर्म है. (199)
ख़्वाबों का भी क्या अनोखी दास्तान हो गयी,
नींद की धुंदली अतीत से बेचैनी हो गयी,
आँखें खोल के पर, जब सपना देख ली
इंसान और दुनिया को कहां तक ले चली. (200)
प्यार किया इतना की मुझको ना होश रहा,
बेहोश हुआ पर निर्बल तो कभी ना हुआ,
दम कितना प्यार का दुनिया तो अनजान रहा,
दुनिया का हर उठा तीर कलियों का बौछार हुआ. (201)
रंगते है लोग चेहरे को, जवानी को बेचैन ढूंढते हुए,
जान भरने की कोशिश रही, पर बेजान मूरत बनते हुए,
राज़ है ढूंढे कई, मगर एक तो काश भूल ही गये,
चेहरे की नूर तो लौटी है, जब हंसी से होंठ खिल गये. (202)
दोबारा बात कह दी, तो हम पर टूट ही पड़े
नाराज़गी क्यों इतनी, फिर कहने की इज़ाज़त ना मिले,
अपना ही समझा है, उल्फत ही इसका नाम रहे,
वरना दिल खोलने की चाह, गैरो से क्यों उम्मीद रहे. (203)
जी ले अपनी मर्ज़ी से, हंसने का बहाना सदा रहे,
काम में धोखा ना रहे, मशहूर राह मिले ना मिले,
अपनों को तू वक़्त दे, दोस्ती शायद दुनिया से
जीना तेरा सही हुआ, मौत पे आंसू जब सच्चे रहे. (204)
मर्ज़ी ख़ुदा की कुछ और सही, कोशिश मेरा तो वही रहा,
कुछ दिन कोई तो जीता है, रोग से कोई तो हार गया,
डर कहा है काम से अपने, जीना मरना तो खेल रहा,
खौफ हुआ जब ख़ुदा बनाया, और मौत हुई तो शैतान बना.
सब की तरह इंसान हूँ मैं, गलतियां तो कभी होनी है,
आंसू पोंचू सब के मैं, वैद की रीत कब बैर है,
जात, धर्म, रंग, भाषा, कभी क्या हमने देखा है,
शोहरत की आस रही थोड़ो को, इलाज़ में कभी ना धोखा है. (205)
लोग कितने आये इस जीवन के राह में,
कुछ से शिकवा रहा, और कुछ दोस्त बन गये
शायद ज़िन्दगी बनती और सुहानी, गर खुद्दार ना होते,
दुश्मन नहीं कितने ही लोग, पर दोस्त भी ना बन सके. (206)
तीर से कितने घायल हूँ, दर्द दिया है लोगों ने,
तन्हाई में रोया हूँ, ठोकर जो लगी है अपनों से,
दुश्मन मिटे यह चाहा हूँ, या दर्द की उनको तड़प मिले,
पर सुकून से ही मैं सोया हूँ, जब बन्दे दिल से माफ़ हुए. (207)
बरसो के बाद मिला है मुझसे, बचपन का मेरा यार,
सुहानी यादो की बरसात में, भीग जाने दो बेशुमार
मुलाक़ात फिर कब हो, जीवन की टेड़े राहो में यार,
आज तो बस जाने की ज़िद ना कर मेरे यार. (208)
दर्द हुआ ज़रूर तेरे जाने से आज हमें
बरसो बाद मिलने का रंग, पल में उतरने से,
घायल दिल, पर राह चलने की इज़ाज़त दिये,
फिर मिलने का वादा जो हमें तू दिल से किये. (209)
हर पल को खुल के चूम ले, ख़ुशी से बस तू झूम ले,
प्यार का ही काम ले, दुश्मन का कभी ना नाम ले,
दोस्त मिला तो हाथ ले, अपनों का दर्द को बाँट ले,
बात सिर्फ एक है जान ले, ज़िन्दगी को दिल से खेल ले. (210)
हर दिल में भगवान् बसा, बात का कोई इंकार नहीं
दुनिया की राहो में लेकिन, दिमाग का भी काम रही,
कुछ लोग यहाँ पर ऐसे जिनसे, दिमाग का तो चैन लुटी,
उनकी हर बात को कीमत दू, इतना जीवन बेकार नहीं. (211)
रात की सुबह तो होनी है, हर दर्द एक दिन पिघलना है,
ठोकर लगी है किस्मत पे, फूलो पे एक दिन चलना है,
दुश्मन कई इन राहो पर, दोस्त का हाथ पर मिलना है,
छूटा जब तक आशा नहीं, हर पर्वत भी सिर्फ धूल है. (212)
चैन और ख़ुशी की रीत यही, प्यार सभी से करले तू,
दर्द जितना भी जीवन में, दर्द ना दे दुनिया को तू,
कर्म और जुबान जब साफ़ रहे, चैन से बस है सोया तू,
सोच से भी जब दुःख ना दे, पूरी ख़ुशी से है झूमा तू. (213)
रूठा है यार मुझसे आज, कोई उसे मना ही लो,
दर्द उठा है सीने में, आग सीने की भुजा ही दो,
गहरा दर्द हुआ है शायद, गलती मुझसे हुई है जो,
बेहद प्यार कभी दोषी है, काश समझे मेरा यार वो. (214)
आशा रही आसमान की सदा, दुनिया में बस लड़ता रहा,
हिम्मत कभी ना कम हुआ, जोश तो सदा एक सा रहा,
कुछ से ही मंज़िल चूकता गया, दास्तान ये काश बना रहा,
छलांग लगाने जब तैयार हुआ, हालात ने पाँव ही बाँध दिया. (215)
मंदिर जाता जब मैं, लोग मुझ पर हंस दिए,
दुनिया है दर्द में, भगवान् का मौन सवाल किये,
जाता हूँ मंदिर मैं, खुद से मिलने के लिए,
मूरत नहीं यारों, वह तो साफ़ है आईना मेरे लिए. (216)
हर जीवन की दौड़ में, कुछ बातें तो एक रहा,
लोग मिले है राहो में, गुजरा वक़्त क्या मीठा सा,
पर कुछ ही वो बचपन के साथी, प्यार सदा ही नेक रहा,
ताली गूंजी हर कोशिश में, हार में रोशन सूरज सा. (217)
कुछ कदम मेरे उठे, कुछ कदम तेरे उठे,
बीच मिले कुछ इस तरह, ठेस किसी को ना लगे,
ज़िन्दगी तो छोटी सी, नफरत से बस ना जले
किनारे बैठे अकेले हम, जी रहे है क्यों झूट से. (218)
जवानी तो टूटा सही, कल के सपनो पर बलिदान हुआ,
बुढ़ापा खूब लुट गया, बेचैन यादों की पिंजर में रहा,
इस पल में जीना जब सीख लिया, दुनिया तेरा तो रोशन हुआ,
जवानी खूब था शायद, बुढ़ापा भी लेकिन कम ना रहा. (219)
याद आया एक भूला सपना, धड़कन हुआ कुछ मीठा,
वह हसीन मुस्कान किसीकी, चैन हमारा कुछ तो लूटा,
ज़िन्दगी का बीत पल, शायद अब तो ना ही लौटा,
कुछ और राह चलते, गर हाथ उसने थामा होता. (220)
अपनी ही बात दुनिया में, कहता गया और चलता रहा,
जाना तक नहीं, और राहो में अकेला सा रह गया.
सीखा देर से अफ़सोस, जब लोगों की बात भी सुन लिया,
अजीब हुआ यारो, दुनिया हाथ लिए साथ ही चल पड़ा. (221)
दर्द में रोया तू, ख़ुशी में झूमा क्यों मदहोश से,
रीत दुनिया की यही, मिलना एक दिन है ख़ाक में.
हार जीत तेरी गायब, दो दिन में संसार से,
महाराज भी भस्म हुआ, बेपरवाह चिता की आग में. (222)
घूमता है इंसान तू, खुद पे इतना गुरूर है,
जी रहा है गर्व से, समझा है क्यों तू अनमोल है,
तू है बस एक आईना, रौशनी तो उस खुदा की है
जान दिया है शिल्पी ने, मूरत आखिर तो एक पत्थर है. (223)
नफरत है जागी दुनिया में कुछ इस तरह
आसान चलना राहो पर, बिछा हो जिसपे शोला
दूंड़ता हर चेहरे में, प्यार की शायद हो कुछ वज़ह,
नज़र मिली पर ऐसी, की हर तरह से हूँ जुदा. (224)
कुछ तो करने की चाह में, महाराज भी चला गया,
कुछ बदलने की आग में, अरमानो का चिता जल गया,
वही चाल और वही रंग, दुनिया कभी क्या बदला यहाँ,
खुद को बदला जब तू, दुनिया रंगों का त्यौहार हुआ. (225)
निर्बल रहे कुछ लोग यहाँ पर, सीख उनसे भी लेनी है,
ठोकर लगी एक इंसान से, दुनिया से नफरत कर ली है,
बाग़ बना है फूलो से, हर फूल की सच में कीमत है,
बाग़ की कीमत क्या है बदला, एक फूल जब उजड़ा है. (226)
कुछ ज़िन्दगी जी ले तू, हर पल है क्यों बेचैन यहाँ,
काम में हो जा मग्न ज़रूर, अपनों को भी समय लगा,
कितना ही तू कोशिश कर, फ़र्क़ नहीं दुनिया को यहाँ,
त्यौहार मना हर पल को तू, बार बार ना तुझको जीना. (227)
नफरत से क्यों रंगी है, यह इमारते रिश्तों की,
फिसलती रेतों से देखो, बुनियादे जो बन चुकी,
लौटे काश बचपन मेरा, जब अपना था हर कोई,
बने है पत्तो की महले, काम नहीं ऐसे रिश्तों की. (228)
बरसो बिछड़ा यार मुझसे है आज मिला,
कितने राह अलग रहे, आज मैंने खूब जाना,
बिछड़ना है बरसो तक हमें तो फिर यहाँ,
दर्द हुआ जब, दो पल भी उनका मुश्किल से मिला. (229)
सपनों में फंस कर ज़िन्दगी से क्या झूझता रहा,
धनुष ना आया मुट्ठी में, उसकी और चलता ही गया,
देख ना सका इस पल के मोती, बिखरे पड़े जो राह में,
हर सपना का दफ़्न करू, बस सपना अब एक रहा. (230)
आईना रहा हर रिश्ता, देखा खुद को जिसमे रोज यहाँ,
कांच सदा ही साफ़ रहे, पल पल तो मेरा ही मेहनत रहा,
टूटा पर यह कांच जब, बिखरा हज़ारों में रिश्ता यहाँ,
जुड़ा कभी मुश्किल से आइना, चेहरा पर दिखा अजीब सा. (231)
मैं ही सिर्फ मैं ही था, कल की बात तो वो ही था,
जहां था बस मेरे लिए, हर रिश्ता तो मुझसे ही था,
आज भी सिर्फ मैं ही हूँ, कल की बात पर ना रहा,
दुनिया जगह पे अपनी है, पर कोई मुझसे ना जुदा. (232)
रूप इतने देख कर मन परेशान हुआ,
रंग, धर्म, भाषा से दिल कितना हैरान हुआ
दर्द और ख़ुशी का पर जब एहसास हुआ,
एक रंग ही मिला मुझको, हर बंदा जिस से रंगा हुआ. (233)
हर दर्द रहा एक छूटा सपना, यादो से रह ले दूर ज़रा,
सुन्दर तेरी कल की राहे, मूर्ख है जो पीछे देखा
तेरे कदम है, तेरे रस्ते, औरो से क्या उम्मीद रहा,
ख़ुशी से तू कदम उठा, जन्नत लिखा किस्मत की रेखा. (234)
हुस्न और इश्क़ की क्या सदियों से बात चली
आशिक़ो ने कितने ही इन बातो पर जान छोड़ी,
ना हुस्न रहेगा ना इश्क़, बाते सब मन की भूत रही,
भगवान् तेरा रूप सदा, तेरी हस्ती तो मिटेगी ना कभी. (235)
कौन सा गाडी तूने चलाया, कितने बड़े घर में रहता तू,
रिश्तों को भी परखा कैसे, शानो शोहरत की चमक से तू.
दुनिया के रस्तो पर क्यों, बेचैन चला है हर पल तू,
धूल में मिलना एक दिन सबको, एक ही जगह पे दौड़ा तू. (236)
ज़माने शायद बदल गए, जवानी तो वही रही,
अंदाज़ सिर्फ बदलते रहे, गलतियां तो होती रही
इस ज़माने की नयी भूल, जवानी की ऐसी हो गयी,
तरक्की की आस में, जवानी को छलांग ही लग गयी. (237)
ज़िन्दगी की कहानी खेल सा बन गया,
आँख खुला और बस दौड़ शुरू हो गया,
बेचैन सपनो ने नींद को भी लूट लिया,
दुनिया जगह पर अपनी, खेल ही तो यह दौड़ रहा. (238)
रोया है इंसान यहां पर, ठोकर से जब भी गिरा,
हँसने की तो चाह रही, मोह की चुंगल में भूल गया,
ढूंढे कितने राह मगर, एक राह ना समझ सका,
दुनिया को ठुकराके हंस दे, वही सबसे धनवान बना. (239)
पहले सांस से आखिर तक, सीधी ही थी तेरी राह,
मक़सद था सिर्फ एक, हर जनम से दूर मिले तुझे पनाह,
कैसा रहा दिमागी जूनून, की टेडी कर दी हर राह,
भटका कितने जन्मो में, लिए कभी नफरत और कभी चाह. (240)
चल रहा हूँ राहों में, हटाकर दुनिया के लोगों को,
सर पे पाँव गिरे हमारे, कैसे कुचला अपनों को,
खुशियों के आशा में कैसे, ढूंढ रहा हूँ राहे कितने,
प्यार को चल मैं मौका दू, हार गया है नफरत अब तो. (241)
पड़ोस का घर टूटे, अपने घर का निर्माण हुई,
कीचड गिरे गैरो पे, स्वच्छता की निशानी हो गयी,
दुनिया की कैसी यह अजीब सी रीत रही,
प्यार की कीमत आज नफरत से ही तौल हुई. (242)
इतिहास के पन्ने भी क्या गज़ब करते रहे,
कहानी थी एक, सौ उसके रूप हो गये
हर अंश किताब का, मर्ज़ी से रंग लिये
कल की सीख ना मिली, पर आज नीलाम हो रहे. (243)
संत कहा क्या फ़र्क़ तुझसे, याद कर पल पल तू उनको,
क्या कोई रोका है तुझको, नाम लेने तेरे जुबान को,
इंसान की आदत रही, भूला जब समय खूब हो,
पहाड़ टूटे जब कष्ट के, भीख माँगा या कोसा उनको. (244)
दर्द दुनिया में रहना है, आंसू तो आँख से बहना है,
अपनों से धोका होना है, दुश्मनी की आग पर चलना है,
हर आंसू पर तेरा मिटना है, वह सुबह तो बस होना है,
एक राह जो पकड़ा है, गलती तो सिर्फ उसे छोड़ना है. (245)
मुश्किल से है राह यहाँ, आसानी से क्या कुछ मिलना है,
दीप जले कभी मध्यम मध्यम, मेहनत को बस ठोकर है,
आशा कभी ना छोड़ मगर, सूरज को उसने जगाया है,
अंधेर जितना भी रात रहा, कसम से सुबह तो होना है. (246)
पुराने यार को बातें सुनादूँ, मेरा भी मन रहा,
कुछ अनबन उनसे, ना जाने कैसे आज हुआ,
शब्द दो आखिर के, उनको ही पर दिल से दिया,
दोस्त ना कही खो जाये, सही तो शायद मैं भी था. (247)
सीख रहा हूँ दुनिया में, रोशन हो कैसे हर पल मेरा,
चूमा जिस पल एक सपना, क्षण में वो पल अतीत हुआ,
काश ख़ुशी के राह दिखे, पुस्तक पुस्तक छान के देखा,
मंज़िल पर तो सदा से मैं, इस पल जीना जब सीख लिया. (248)
बेचैन हुआ है यह जग सारा, नफरत इतनी जाग चुकी,
नज़र रही है एक अपनी, बाकी सब तो फ़िज़ूल रही,
तेरी गलती ही मेरी सच रही, और कोई ना सबूत बनी,
धर्म-विज्ञानं क्या काख जोड़ी, टुकड़े दुनिया के लाख कई. (249)
मतलब ढूंढा कितना मैं, इन जीवन की राहो में,
हार जीत की धुन रही, क्षण क्षण बस वो धूल बने,
जीना, मरना, धूप -छाँव, रहे खेल बस दो पल के,
एक पल की खोज यहाँ पर, हर पल जिसमे शरण लिये. (250)
प्यार की समझ में कैसे, सदियों से रीत रही,
अपनों से प्यार की तुलना, गैरो से नफरत बनी,
प्यार की क्या अजीब, ये परिभाषा हो गयी,
तेरे घर के टुकड़े, मेरे घर के नींव बन गयी. (251)
गुज़रती है ज़िन्दगी यहाँ, जाने किस रफ़्तार से,
पलक भी झपका नहीं, राह आधे निकल गये,
दोस्त है बचपन के कुछ, रोशन दिये इन राह में,
कितनो से ऐसे होना है, नज़र कभी ना फिर मिले,
बचे है कुछ ही हीर यहाँ, छोडू गिला शिकवा आज मैं,
खूब हँसते अब सफर कटे, पुराने यार के बातों से. (252)
तूने मान लिया एक ही जीवन तो बस रही,
मैंने माना जीवन और रहे, मोक्ष के मौके कई,
तूने कहा भगवान् कही है ही नहीं,
मैंने कहा भगवान् है कहा नहीं,
तूने कहा यही वक़्त है, कुछ और नहीं
मैंने भी खोजा एक वक़्त, जहाँ वक़्त ही नहीं,
नज़रिया का अंदाज़ है, गलत तो कोई नहीं,
जीते है चल अपनी ज़िन्दगी, दोस्ती पर कोई आंच नहीं. (253)
चीरते हुए भीड़ को, तरक्की क्या खूब चूम लिया,
बिखरे फूल हर राह में, बाज़ी हर तूने जीत लिया,
तालियों की गूँज उठी, मिलने को जग तड़प गया,
जाम पर उठा ना दोस्तों का, मतलब नहीं कुछ इस जीत का. (254)
हसीन था वो मुलाक़ात, यार पुरानो से मिलना,
रोक कर ज़िन्दगी कुछ पल, यादो में बहक जाना,
खोया बचपन की नादानी, दोस्तों के हँसी में मिलना,
आंसू तो पिगले खूब, सुन्दर अब यह सफरनामा. (255)
नकाब दुनियादारी ने गज़ब पहना दिए,
समुन्दर सा गम, और होंठो पर हँसी ला दिए,
समझा नहीं नफरतो के बेलगाम रफ्तारे,
गले तो लग गए, पर नाखून रूह तक उतर रहे. (256)
बड़ी मुश्किल से संभले, कैसे यहाँ रिश्ते,
वादा ज़िन्दगी का था, एक पल में टूट गए,
मज़बूत तो था दीवार, हलकी सी दरारे बने,
दरारे तो भरे नहीं, दीवार नए बन गए. (257)
दुनिया भर से रिश्ता जोड़ा, अपनों का तो हाथ छुटे
चला अंगारो पे हर पल, समुन्दर चारो ओर लिए
आसमान पर उड़ता ऐसे, पल एक ना हो ज़मीन पे,
दौड़ा इंसान इतना यहाँ पर, चलना भी कैसे भूल गए. (258)
खेल रचाये खूब उसने, अनंत जन्मो के राह पे,
दूर रखा मोक्ष कितना, हर पल फिर भी साथ है,
सुख के तो राह दिखाए, दुःख मिल रहे है अंत में,
स्मरण मन्त्र का दवा दिया, पर दर्द में हर पल तड़प रहे. (259)
झगड़े तो बस है रोज़ यहाँ, मुद्दों पर हर पल लड़ाई है,
तलवार चले किस ओर से कैसे, राह हर एक कठिन है,
बचपन की कोख में सुकून था, यार पुराने कुछ बाकी है,
उनसे भी गर झगड़ा मोल लिया, जीना तेरा तो व्यर्थ है. (260)
क्या सच और क्या झूट, कौन इसे समझ सका,
रंग एक सौ अंदाज़, नज़र से अपनी सबने देखा,
सरहदों पर गला काटा, प्यार का एक रूप बना,
देश प्रेम का बात किया, इंसानियत का दुश्मन हुआ. (261)
रोशन सुबह की आयी तो, रात ना कभी दूर है,
जन्म हुआ जब तेरा यहाँ तो, नियम से मौत भी होनी है,
दीवार पे बदले चित्र हर पल, सच वही एक दीवार है,
कल, आज, कल बस चित्र है, सब सदियो से सिर्फ एक है. (262)
जीने का तो मतलब नहीं, अंदाज़ पर रहा ज़रूर सही,
दर्द और दुनिया गैर रही, आशा तो अपना सदा रही,
मंज़िल पर शायद सब कुछ वही, दौड़ को लेकिन रोक नहीं
अपनों की नफरत मुश्किल सही, प्यार ही आग की जल रही. (263)
दर्द उठा जब सीने में, रोने की आवाज़ तो एक सुना
बच्चा हँसा और हाथ लिया, हर दिल का धड़कन एक रहा,
अपना जब रूठ के दूर चला, मायूस गला क्या अलग सा सूखा
जात धर्म कही दिखा ना मुझको, सामने मेरे तो इंसान खड़ा. (264)
मोक्ष ही मंज़िल मेरा, धर्म-जात मेरी राह है,
मंज़िल हर है झूट इधर, सच तो सिर्फ मोक्ष है,
हज़ार राहे है मंज़िल को, किसी राह में ना खोट है,
मंज़िल पर ही शायद कह सके, की राह हर एक झूट है. (265)
दोस्ती शायद वही रहा, ज़ुबान मेरी जहाँ खुल के चला
डर नहीं इज़्ज़त खोने का, ना ही आँख से गिरने का,
बचपन कभी मिल ही जाए, समझना भूल की दोस्त मिल गया,
शब्द जहाँ तोला मैंने, वहाँ सिर्फ हलकी पहचान रहा. (266)
क्यों झगड़ रहा इंसानो से, आग से हर एक लिपटा है
छोटी बात बने चिंगारी, शोले बनाये नफरत के
अलग शायद हर इंसान यहाँ पर, आंसू तो एक सा छूटे है,
कुछ फ़र्क़ नहीं नन्हे जीवन में, माफ़ करके बस जी ही ले. (267)
नफरते हज़ार दिल से निकाला, औरो की नफरत पे ठेस लगा,
हर विरोधी से गिला रहा, खुद की हुई बात तो रूठ गया,
मोहब्बत करना तो सीखा नहीं, गैरो का प्यार झूठा कहा,
ज़ख्म देना तो हक़ समझा, चोट लगी तो बस बदनाम किया. (267)
देश के हाल अजीब कितने हो गए
रस्तो के ठिकाने नहीं, गति भंजक पर बन गए,
सांस लेने को भी यहाँ लगान भर रहे
सरकारी दफ्तरों में जेब खाली हो रहे
नज़ारा पर अजीब, देखू जब शहर के रस्ते,
लाखो की गाडी चले, चवन्नी रस्ते तो टूटे पड़े. (268)
सुबह की लाली छायी है तेरे चेहरे के नूर में
ठंडक है मुस्कान की, नहीं चाँद के रोशन में,
अनमोल यह सुंदरता देख, उठा एक उमंग दिल में,
क्या मैं झूम सकता हूँ आज, दोस्तों की महफ़िल में. (269)
राजा हो या रंक हो, कौन छिपा दर्द से है यहाँ,
महल रहा या सड़क हो, दुःख ना दूर है कहाँ,
दिखता है शान कभी, रंगीन लगे जीवन का रस्ता,
आंसू तो बहे हर दिल में, किसी को न ठोकर लगा. (270)
रुकता नहीं कभी, जीवन की क्या यह दौड़ चली
राही तो मिले हाथ बढ़ाये, नज़र अफ़सोस दौड़ पे रही,
दोस्तों का नाम नहीं, रिश्तों का कोई काम नहीं,
जीत तो हुई दौड़ में, मनाने को पर एक भी नहीं. (271)
नींद से पहले हर दुश्मन को माफ़ी दे
नफरत को दूर कर, और मुश्किलों से झूझ ले
एक बार है जीना तुझको, फूलो से तू खेल ले
जीने का दस्तूर बना, हर दिन तेरा जन्मदिन रहे. (272)
सुन्दर था साथ तुम्हारा, बचपन सुहाना कितना मीठा
आधी ज़िन्दगी गुज़र चुकी, उम्मीद नहीं अक्सर मिलने का.
व्यस्त हर कोई किस्मतो से, ठोकरो से बेबस रहा,
कभी कभी कुछ बातें अभी, मतलब नहीं इन झगड़ो का. (273)
दुनिया में गर आया है, दर्द से तुझको जीना होगा,
जीवन की राह चलना है, मुश्किल हाथ में लेना होगा,
साफ़ राहे एक ख्वाब है, कांटे रोज़ तुझे चुनना होगा,
मंज़िल अपनी जगह पर है, मस्त चलना ही सही अंदाज़ होगा. (274)
समझना है मुश्किल आज का नया ज़माना,
कठिन कितना हुआ नफरत की मात्रा घटाना,
कहे तंत्रज्ञान से इंसान का एक हुआ अफसाना
चिल्ला रहा आदमी अकेला, गायब हुआ पर सुनने वाला. (275)
सौ है कारण हँसने को, एक बात पर रोना क्यों
सौ है दोस्त जहां में यारो, एक दुश्मन से रूठा क्यों,
हालात शायद कैसे भी हो, अपने तो सदा ही मिलना है
आँख खोल के जी ले जीवन, ख़ुशी हर सांस में पाना है. (276)
कदम बढ़ा तू ध्यान से, मुश्किल गिरे बस धूल में
नया है आज साल यह, हर दिन चले बस प्यार से
छूटे पुराने दर्द से, रहे गिला ना इस दिल में,
आज है उगादी यारों, माफ़ कर सबको और झूम ले
डर नहीं यार मेरे, आगे की राह को देख के
गम नहीं इस बात पे, खिलेंगे कैसे कल फूल ये
भूल कभी ना दोस्त यह, मिले है खूब हम सब तुझे
कांटे चुनेंगे तेरी राह से, फूलो से हर कदम सवार के. (277)
मोह और घृणा से चले जीवन, मंज़िल पर अंधेरो में,
ज़िन्दगी दौड़ रहे हम, दो ही पहियो के जाल में
इंसान पर बहका हर पल, इस बेतलब जूनून से,
रुका इस पल तो हर मोती, रफ़्तार पर और बढे. (278)
जिस्म से इतना क्यों मोह रहा
रोग से बचा है कौन यहाँ
नियम हर जन्म का मौत रहा
मिट्टी में मिलना है एक दिन यहाँ
पागल सा क्यों झगड़ रहा,
चीख चिल्ला कर चलता यहाँ
किसी भी बात से ना फ़र्क़ रहा
प्यार से बस तू गुज़र यहाँ.
बात एक सदा से सच रहा
प्यार सिवा ना मंत्र यहाँ
प्यार मिला तो मोम बना
इंसान की पहचान बस एक यहाँ. (279)
मिलने का ना कोशिश हुआ, रिश्तें दूर तो अचम्भा क्यों
जबान पर कभी ना मिठास रहा, ना बचा दोस्त तो हैरान क्यों
छोटा जीवन दिन है ढलना, रात में दुनिया को कोसा क्यों,
हंस ले थोड़ा, मिल ले ज़रा, शिकायत अकेलेपन का रहना क्यों. (280)
दौड़ रहा है दुनिया में, एक पल ना आराम रहा
हर जीत रहा बस दो ही पल, लक्ष्य सदा ही खिसक चला
राहे गलत सदा से यहाँ, अनमोल ख़ुशी तो भीतर रहा
पहुंचा जो एक बात कहा, राह और मंज़िल थे ही कहाँ
पूर्ण ख़ुशी का तू रूप रहा, तू सदा ही भगवान् यहाँ. (281)
सबसे प्यार करता हूँ, दीवाना तो मैं नहीं,
लोगो पर सदा से मरता हूँ, पागल भी मैं नहीं,
शैतान सा कभी ना बहका हूँ, भगवान् तो मैं नहीं,
इंसान अच्छा बन सकू, इसके सिवा कुछ कोशिश नहीं. (282)
फर्क़ ना तेरे जीवन से, दुनिया तुझ बिन सदियों से
कल के राह जगह पे अपने, आज के जीत बस दो पल के
काम तेरा तो एक रहे, हर लम्हा भर दे प्यार से,
कदम उठे तो जोश से, हर सांस में सिर्फ ख़ुशी रहे. (283)
कोशिश कितनी कहानी में, हर बात में रही कशिश सदा
हर आग में जलकर देख रहा, कही तो शायद नाम मिला,
आवाज़ भूलकर भीतर का, दुनिया से भिड़ के खूब चला,
तड़प रहा है जीवन सारा, जग छूटा क्षण में अनजान हुआ. (284)
फूटा दुनिया टुकड़ो में, हर सीने में है आग लगी
नफरत इतनी जाग उठी, हारा धर्म और विज्ञान अभी,
रिश्ते गैर और अपने दुश्मन, धुंधली ख़ुशी है रीत बनी,
प्यार का नाम तो भूल चुके, हर दर्द का इलाज़ जो एक रही. (285)
सुहाना कितना बचपन वो था, ख़ुशी सिवा कुछ और ना था,
बारिश में खूब भीगना था, कांच की गोलियों में आनंद था,
दोस्तों का क्या वो महक था, धर्म, जात तो कोसो दूर था
आज हर मुद्दा अहम सा रहा, दोस्त या ख़ुशी का नाम कहाँ. (286)
दुनिया और दिमाग, एक सिक्के के दो चेहरे
उठते है साथ-साथ, डूबे भी एक बनके
पहले दुनिया तो बना विज्ञान, बाद कहे तो धर्म रचे
हकीकत तो दोनों के अतीत, बात यही हर संत कहे. (287)
हर राह बिछी है दर्द से, समझा नहीं कितने रूप कोई
पहली सांस से आखिर तक, साया है दर्द जो छोड़े नहीं,
विकास का कारण कहे, रुकावट का रूप कोई,
दर्द ना होता यहाँ, नाम लेकिन उनका होता ही नहीं. (289)
चांदी तो मिल चुकी, अब स्वर्ण की बारी है
रास्ते है नासमझ पर, हाथ लिए हाथ चलना है,
नियम हर टूटे यहाँ, रिश्ता तो अटूट रहना है
थामा है हाथ जब, हर सांस एक दूजे से रहना है. (290) On Dr. Ramesh’s 25th marriage anniversary
ग़ालिब का जन्म हर शहर में होता है
जहाँ है दर्द वहाँ शायर होता है
ख़ुश नसीब थोड़े जिनका नाम होता है
बाकी हर तो मुफ्त बदनाम होता है. (291)
छोड़ पुरानी बातो को, छोड़ छूटे यारो को,
काम नहीं है इनका तो, ज़ंज़ीर लगाए आज को,
हाथ बढ़ाया मिलने को, कौन है रोका रफ़्तारो को,
तोडा जब यह अतीत को, पहला कदम तेरे मोक्ष को. (292)
एक रस्ते से आये सब, कितने रस्ते है जाने को,
खेल बस है कुछ पल का, बेचैन करे इंसानो को,
भगवान् ही वो रहा, नक़ाब हज़ारो पहना है जो,
नक़ाब उतरे सोचा कहाँ, मंज़िल पर रहकर दूर है जो. (293)
दुबला होना या मोटा होना, किस्मत का ही खेल है,
सुंदरता का तोल लगाना, मूर्ख दुनिया का रिवाज़ है,
अपनी जगह पे हर इंसान, लाखो जबान की दुनिया है,
दर्पण मुझको प्यारा लगे, दुनिया तो सिर्फ राख है. (294)
प्यार के संदेशे कितने, हम तो डूब ही गए,
नफरते पर दुनिया के, बिन लगाम दौड़े चले,
उत्सुक बैठा हूँ देखो कैसे, जहां को लगाने गले,
अपने गैर पर बनते गए, आग दिल में बढ़ाते हुए. (295) On the effects of social media in our lives.
खूब चली है नफरत यारो, दुनिया आज तो टूट रही,
परख रहे है हर रस्ते को, धर्म तक आज बदनाम हुई,
इंसान भरे है घाटी को, बाँध के दुनिया को रस्सी,
हर मंत्र बना अब प्यार को, रस्ता दिखे ना और कोई. (296)
रोग लगी है इंसानो को, हंसना कैसे भूल गया,
शिकवा करे रोज़ नया, नफरत रोम-रोम में भरा,
एक बात ही ना समझा, सूत्र ज़िन्दगी का भूल चूका,
जीते जीते है मर जाना, मर मर के यह जीना क्या. (297)
किसी के सुन्दर तक़दीर पे, जलना तो फ़िज़ूल है
फैला दर्द हर तरफ यहाँ, बड़े चुपके से पर झांके है
बातो में विश्वास, सुन्दर सी हंसी कई बार सुनहरा झूट है
दर्द से बहका हर इंसान, कुछ नक़ाब तो बस मजबूत है. (298)
रिश्तों का रुख देखो, कैसे बदल रहा है यहाँ
गैर से भी दूर अपने, खुलकर अब जहाँ
अनोखी सी रिवाज़, अपनों का खूब है चला
ना मिलने का ख्वाइश रहा, ना बुलावा का नाम रहा. (299)
ना जीने का अंदाज़ बदला, ना बातो का रंग बदला
रफ़्तार बस कम हुआ, बचपना दिल का वही रहा
नज़रिया दुनिया का बदल गया, बढ़ता उम्र ना देखा गया
मुस्कुराहट कभी हर अदा पे, हर बात से अब चिढ़ ही रहा. (300)
दुनिया में खेल, क्या अजीब रंग ले रहे,
आनंद कही दिखा नहीं, सिर्फ जंग ही हो रहे
ज़माना गुज़रा जब हारो के मिलते थे गले,
प्यार का नाम दूर, अब नफरत ही दिख रहे. (301)
जन्म की जब बात चली, व्यर्थ कल में फंस गया
सोच हुई जब मौत की, गुप्त कल से बेचैन हुआ
मुक्त हुआ हर आह से, आज और अब गले लिया,
ना जन्म था ना मौत है, अनंत इस पल में जी गया. (302)
दौड़ा जब तक दिमाग ये, दुनिया जिन्दा हर खेल में,
लाख युद्ध है हो रहे, करीब इंसान कोसो दूर है,
व्यर्थ ढूंढे रोशन को, वक्र दुनिया के अंधेरो में,
जंग भीतर का एक जीत जा, जहाँ का हर युद्ध विनाश है. (303)
बीता कल एक सपना था, हार-जीत बस मज़ाक था,
किसने देखा कल की सुबह, हर सपना एक मज़ाक रहा,
हकीकत माना हर एक सपना, आज को कैसे मज़ाक बनाया,
सदियों से इंसानो की अदा, हर जीवन सिर्फ मज़ाक ही रहा. (304)
घर, समाज, देश और दुनिया, सब प्यारे और सब है अपने,
बढ़ते मात्र में फैले मुझसे, किसी को पर ना ठोकर लगे,
संकट की जब आंधी चले, करीब को त्यागा बड़े के लिए,
धर्म जुबान तो यही रही, बिन कारण त्याग महाक्रूर कहे. (305)
सुख और दुःख से चले यह जीवन, एक पल ना आराम रहा,
कोख से लेकर कब्र तक, चाह के बल से सफर कटा,
अच्छे बुरे के चक्की में फंसे, मुरादों से लाखो जन्म मिला,
इस जन्म का बस है एक मुराद, और जन्म ना कोई रहा. (306)
वक़्त का भी बड़ा ज़ालिम सितम है
ज़माने ने हमें भी कभी सुन्दर कहा है
दिल से ही लेकिन आज प्यारे होते है
पुराने तस्वीर ही बस खूबसूरत दिखाते है. (307)
ढीला-ढाला ही हुआ हूँ, कम आवाज़ मैं करता हूँ,
गुस्सा घेरे है तूफ़ान सा, डर से अब मैं रहता हूँ,
किसको कब चोट लगे, क्षमा मांगते राह चलता हूँ,
आधा सफर है कट चुका, दुनिया से अब ना भिड़ता हूँ. (308)
बैर से दूर ही रहना है, दिल साफ अब रखता हूँ,
नफरत को हटाना है, झगड़ो में अब ना रहता हूँ
झूम ले सब बस ख़ुशी से, जीना है मुझे भी कहता हूँ
दवाई रंगी है आज जीवन, दोस्तों का साथ ना छोड़ता हूँ. (309)
मेहनत और मुश्किल हर राह का नाम होता है
हुनर हर बार कांटो के सेज़ पर ही लेटा है
सामाज का रंग लेकिन अनोखा बस रहता है,
तवायफ़ बदनाम, खिलाडी को ख़ुदा बनाया है. (310)
कुछ करने की चाह में ज़िन्दगी ही निकल चुकी,
कुछ कहने की आस में आवाज़ भी निम्न हुई,
रिश्ता बना दू दुनिया से, तड़प लेकिन छूटा नहीं,
ना मिला दुनिया काश, ना अपनों का साथ रही. (311)
ख़तम करे अब झगड़ो को, तू तू मैं मैं खूब हो गयी,
हाथ रंगे है खून से तेरे, मैं भी दूध से धुला नहीं
परिवर्तन हुआ हर दिन यहाँ, पर नफरत दिल से जाता नहीं
बदले नहीं अतीत यहाँ, सुनहरा कल तो मुमकिन सही. (312)
इंसानो से हुई गलती, इंसानियत को बदनाम किया
अभागा को दर्द झगड़ो में, धर्म और देश बदनाम हुआ,
देश सभी का, धर्म सभी का, राजनीती से परेशान हुआ,
डरना नहीं है एक दूजे से, नेता पत्रकार को दुत्कार दिया. (313)
एक बार तो मरना है, डर डर के है जीना क्या
मरते मरते हर पल जीना, अंदाज़ जीने का भूल गया
चार पल तो जीना यहाँ, जवानी क्षण में ओझल हुआ
सर उठा के जी ले बस, फ़र्क़ जहां को हुआ कहाँ. (314)
अन्याय चारो ओर बसा, धर्म मेरा क्यों बदनाम किया
सालो से मैं भी तड़प रहा, मेरी बात भी कह दे ज़रा,
मेरा धर्म है मेरा रास्ता, प्यारा तुझको तेरा लगा,
देश सदा से यही कहा, मंज़िल तो सिर्फ एक रहा,
तोड़े देश को देश के दुश्मन, धर्म पे अब नहीं है लड़ना
प्यार किया है इंसानो से, धर्म से तेरे मुझको क्या. (315)
गौ के नाम पर हत्या करना, पगलों का है काम सही,
हत्या तो हत्या रही, कोई भी कारण मुनासिब नहीं,
धर्म के मुद्दों पर मारना-मरना, धर्म समझ की खोट रही,
जीना है प्यार से जीने दो, हर धर्म की शायद सीख यही. (316)
धर्म रहे इस देश के कितने, अलग रंगो से देश है निखरा,
देश का नीति पर एक रहा, हर इंसान तो अपना हुआ
मौत लिखा है कहाँ शास्त्रों में, गौ रक्षा में जो खून किया
इंसानो से हो रही गलती, धर्म को क्यों बदनाम किया.
शान्ती सिवा और ना बात, सदियों का यह गूँज रहा
अपनी मर्ज़ी से जी ले सब, सनातन धर्म ज़ोर से कहा
डरना नहीं यहाँ किसीको, हर धर्म तो सरो-आँख रहा
इंसानो से हो रही गलती, धर्म को क्यों बदनाम किया
हर वासी तो खून है मेरा, माँ- बाप तो मेरा देश रहा
राहें कितने हो अलग, मंज़िल तो अपना एक बना
देश का नाम है रोशन करना, कुछ लोगो से नहीं बिगड़ना,
इंसानो से हो रही गलती, धर्म को क्यों बदनाम किया. (317)
अभागा बड़ा हिन्दू यहाँ, शर्म से सर है झुका हुआ
देश का दिल तो हिन्दू रहा, हर रंग सदा ही गले लिया
अच्छी बातो का हर कारण, देश बड़प्पन का नाम दिया,
बुराई लेकिन जब भी हुआ, हिन्दू धर्म ही दोषी हुआ. (318)
ON TIME AND ITS MYSTERIES
बचपन के यार कुछ पल के लिए ज़िन्दगी में आ चले
बीता हुआ हर सुनहरा पल भेंट में ला दिए
बिखरे फूलो पर आंसू नहीं, मंज़िल की चाह अब छूठ गए
नामुमकिन ख्वाइश सिर्फ एक रही, वक़्त आज बस थमे रहे. (319)
यार पुराने आये झूम के, बीते सपने बस ज़िंदा हुए
हर पल था जन्नत का सफर, कुछ दिन हमने खूब जिये
चले अपनी राह आज, हसीन कल के खोज लिए
ख़ुशी तो है आज और अभी, समझा जब अकेले हुए. (320)
कौन है समझ सका वक़्त का यह हसीन छल,
माया किसी ने कहा, धुंद रहा कल, आज, और कल,
हकीकत माना है कोई, रंग बदले जब समय के जल
चंचल नदियों में ढूँढू ख़ुशी, ब्रह्माण्ड लेकिन जब भी थमा ये पल. (321)
जनम की क्या चाह रही, डर रहा क्या मौत का,
अनमोल यह संसार क्यों, शिक़वा है क्यों हर रीत का,
धर्म, दर्द, दुनिया यहाँ हर पल मुझे क्यों पुकारता,
डूबा पर इस पल में जब, समस्त जहान बस धूल हुआ. (322)
पुण्य नहीं करना है मुझे, पाप से अलग बने दीवार
चीखना नहीं इंसानो पे, जानवरो से हो ना लगाव
खूब जी लिया दुनिया में, मुर्दा था जनमो से बेशुमार,
चाह एक की चाह ना रहे, ज्योत बनकर बन जाऊं प्यार. (323)
सोच कर जहाँ बात मेरी चल पड़ी
दोस्ती का नाम वहाँ क्या काख रही
रीती रिवाज़ से ज़िन्दगी व्यर्थ ही गुज़र गयी
रिश्ता जोड़ वही, जबान जहाँ खुल के चली. (324)
आया हूँ जब दुनिया में, गलतियां तो है करनी
तू भी इन गलियों का राही, तू क्या इनसे दूर सही
वक़्त और मेहनत सुझाव है, पार हुआ है हर गलती
गलती पर तेरी रुक जाना, इस गलती का तो हल नहीं. (325)
नाराज़ हुआ क्या मुझसे यारा, मैं तो सदा ही गलत रहा
रूठ के मुझसे दूर हुआ, नादान अकेला ही छूट गया
दुनिया में हर पल था डूबा, हार जीत में फंसा रहा
आज छोड़ दू दुनिया को, गर दो पल का तेरा साथ मिला. (326)
भाषा, रंग, धर्म, जात से, कितना आज अकेला हुआ
नफरत जागी है इतनी, प्यार का तिनका भी दिखा कहाँ
दुनिया आगे क्या काख बड़ा, हर बोली सिर्फ अलग किया
जन्नत कहाँ बना है दुनिया, इंसान बुरा सा हार गया
लड़ता आज हर मुद्दे पर, अपनों पर बस चीख रहा
उदास हुआ जब देखा दुनिया, मौका था बस धूल हुआ. (327)
डरता ही रहा मैं उम्र भर, दुनिया कही ना छूटा यहाँ
सांस पकडे बस दौड़ रहा, हार की ख़ौफ से जला हुआ
अधूरा स्वप्न हर पूरा किया, मंज़िल पर लेकिन आँख खुला
दौड़ में मुझको दुनिया मिला, रुकता शायद तो जन्नत ही था. (328)
सौ चेहरों का नकाब लिए, घूमे हर पल इंसान यहाँ
छुपता नहीं पर एक सही, सौ का और निर्माण हुआ
भीतर ज़रा यह नज़र फिरा, चेहरा मिला तू खुद से यहाँ
चूर हुआ हर चेहरा घना, इंसान गायब सिर्फ भगवान् रहा. (329)
जानवर में देखा हर रंग, प्यार, नफरत, दर्द और गिला,
भूख, प्यास, गलती और सज़ा, कहाँ अलग है इंसान यहाँ,
कुछ ना हमने सुना जुदा, कह दे जो इंसान है बड़ा,
एक शायद पर बात रही, जो इंसान सदा से भूला चला,
कौन हूँ मैं यह पूछ सका, भगवान् बना और हुआ जुदा. (330)
मुश्किल राहे अब तक थे, रस्ते आगे बस साफ़ है
कांटे है पर रुकना नहीं, ज़ोर से ही अब बढ़ना है
धर्म, जात, रंग, भाषा, मुट्ठी एक बन जाना है
ज़ंज़ीर अतीत के तोड़ कर, प्यार से देश को चूमना है.
नज़र पड़ी है फिर भारत पे, ना अब इसे कोई छूना है
दुनिया कह चुकी अपनी बात, बारी अब हमारी है
खींचा खूब देश को दुनिया, अब तो बात पलटनी है
प्यार सदा से देश का मन्त्र, भारत ही कल का उम्मीद है. (331) -AUGUST 15, 2017
बचपन से लेकर बुढ़ापे तक, यूहीं साल बस पिघल गए
हर पल ही बेचैन रहा, अपनों के खातिर मरते हुए
अपनी बात कहने को, गैरो से फ़िज़ूल लड़ते हुए
ज़िन्दगी भर दौड़ा चला, एक ही जगह पर खड़े हुए. (332)
कितने कर्म कर गया मैं, उम्र कट गया मेरा आधा
दुनिया तो बस वही रहा, इंसान एक ना बदल सका
थक गए है कदम मगर, मंज़िल कही ना दिखा यहाँ
समझा आज बदलना ख़ुद को, मंज़िल सदा तो मुझ में रहा. (333)
कैसे देश के पालक यारो, ढंग से बात ना एक बना,
हर मंत्री और हर एक दफ्तर, ज़ुनून से देश को कैसे लूटा
चुनाव हुआ है हर पांच साल, भीख प्रजा से झूम के माँगा,
किस खंजर से खुद को मारू, वोट इस बात का हरदम हुआ. (334)
दुनिया समस्त ने बात कहा, कला भगवान का रूप रहा
कलाकार की लेकिन हो गयी पूजा, भ्रम से गलती होता रहा
गुणी तो बस इंसान ही था, गुण कर्मो का फल रहा
भ्रष्ट हुआ जब मशहूर बंदा, दुःख है व्यर्थ समझ ज़रा. (335)
जीवन की तेरी कीमत नहीं, मौत पे सरकार समर्थ है,
मौत की जगह पर हो सही, वरना सरकार लाचार है
रेल या बस से मौत हुई, कीमत तेरी चार आना है
डाकू वैद से लाखो दिलवाई, अस्पताल में गर सांस छोड़ा है. (336)
जीत की यहाँ कहानी तो, हार भी कुछ सुनाता है,
आसमान को कभी चूमा तो, ज़मीन पर कभी लेटा है
एक पल यह दुनिया तो, एक पल सब बंजर है
फूल और पत्थर राहो के, मंज़िल रहा कुछ और ही है. (337)
शुरू हुआ कहाँ, हुआ कहाँ पे अंत है
राह ना दिखा यहाँ, दिखा ना कोई मंज़िल है
अनंत ही यह चक्र रहा, सब कुछ बस गोल है
जन्म मौत आया गया, सच तो कुछ और ही है. (338)
हज़ारो साल का चरित्र इस देश का रहा
दुश्मनो की हम पर नज़र गिरता ही रहा
मिट ना सके हम, कोशिश कितना भी खूब रहा
ज़मीन गिरे लेकिन गगन को छूने उठता ही रहा.
धर्म-अधर्म की बातें देश में होता रहा
राजा कई बार चोर बनकर लूटता रहा
जनतंत्र भी शायद देश का मुश्किल रहा
दम है कुछ मिटटी का, मुसीबत हर टूटता रहा. (339)
हार जीत में कुछ ऐसे फंसा, किरण मुझको ना एक दिखा,
अनजान मंज़िलो की रही पुकार, कोख से निकलते ही दौड़ चला,
जीना इसी को कह दिया, दुनिया इस बात से गूँज उठा,
मौत के पहले मुड़ कर देखा, जिया तो कभी था ही कहाँ. (340)
ज़माना लिये रोज़ एक नया कदम
नफरते विशाल लेकिन, प्यार हुआ कम
चुप रहना है मुनासिब, आवाज़ रही ना दम
मुँह खुला और टूटी दुनिया, हँसना तक भूले हम. (341)
टूट रहा है हर रिश्ता, चीख चिल्लाना ही हम सुने
ओज़ल हर एक दोस्त हुआ, दुश्मनो के कतार नए
अपनों का ना नाम रहा, धन में माँ और बाप दिखे
मौत-नरक से डर कहाँ, डर लागे अब दुनिया से. (342)
कुछ इरादे, कई मुरादे, कुछ वादे, और ढेर से यादे
कूट कूट भरा है घड़ा मैंने, हर रंग के धूल से,
रोता ही रहा ज़िन्दगी भर, आया ना ख़ुशी किसी ओर से
रोशन हुआ है राह जब, हर कण किया खाली इस घड़े से. (343)
पहुंचना है उस मुकाम पर मुझे,
मांगता हूँ दुआ कुछ भगवान् से
मौत का ख़ौफ़ ना जीने का मोह रहे
दुश्मन हो सामने तो आइना ही दिखे. (344)
चला था मैं कुछ इस तरह, दुनिया ही बदलने को,
राह और मंज़िल चुना, बरसाने बस खुशियों को
देर तक भूला अपनी बात, माया ने घेरा नादान को
मंज़िल से था शुरू हुआ, फ़िज़ूल यह सफर समझने को. (345)
ज़ुनून है दिमाग का, जहान कभी तो था कहाँ
ना पाप है ना पुण्य ही, जाल है हसीन सा
खेल जन्म मौत का, धुन में बस चला चला,
हार जीत मज़ाक ही, तुझ सिवा दूजा कहाँ. (346)
मुढ़ कर देख लेते, नज़र हम पर भी कुछ फेंक दो
उड़ते रहो आसमान पे, है परिंदे उड़ ना सके जो
साथ हम भी थे कभी, अतीत राहे तेरी सजाने को
वक़्त तो नहीं, इक शाम का हक़ ज़रूर आपके साथ को. (347)
चक्र अनोखा देख, दिन और रात की कैसे रही,
काम किया है दिनभर पूरा, नींद रात की हो सही,
सोया लेकिन रात को जब, इसी बात की आस रही,
नींद हो जाए इतनी सुन्दर, कर्म चले दिनभर पूरी. (348)
कर दिया माफ़ दुनिया को आज, कोई गिला ना रहा
डर नहीं है अब किसी से, किसी को मुझसे ना रहा
कई रंगो का खेल रहा, ख़ुशी और घर से दूर चला
घर सूना है दिल के अंदर, सीधी राह पर अब मैं मुड़ा. (349)
मंदिर मस्जिद बनी इंसानो से, हाथ जोड़ा भी इंसान यहाँ
गलती किया जब इंसानो ने, धर्म को क्यों बदनाम किया
मन्नत पूजा तो राह रहे, मंज़िल तो सिर्फ भगवान् रहा
ना मंदिर है, ना मस्जिद है, हर दिल में भगवान् यहाँ.
प्यार को मौका ज़रा से दे, तुझसे बड़ा ना भगवान् यहाँ
माफ़ कर हर इंसान को तू, हर धर्म को बस गले लगा
भारत की यह रीत रही, इंसान को धर्म से ज्यादा माना
भगवन सिवा ना कुछ भी यहाँ, एक बात बस जान ज़रा. (350)
ज़माना एक जब रावण था और एक राम भी,
समझे उनकी गाथा जो, रहे दुनिया में लोग कुछ ही,
जल रहा है रावण यहाँ, हर पुतली तो धूल बनी,
भस्म किया है रावण को, बन क्या सका तू राम कभी. (351)
भारत पर है सबका हक़, इस देश का मोती वेद रहा
गवाह पर इतिहास रहा, नास्तिक तक मंदिर में बोला,
हर धर्म की बात सुनता आया, सदियों से यह देश मेरा,
कुछ शिकवा हमे भी है, बदनाम न कर बस सुन ले ज़रा. (352)
जीत का मुखड़ा देखो यारो, क्षण में कैसे लुप्त हुआ
गज़ब हार का लेकिन प्यारो, जीवन भर का तड़प दिया
हार जीत पर ले मुठ्ठी में, झट से दूर जो फेंक चला
पहचाना मंत्र वो जीने का, ख़ुशी का सदा ही रूप रहा. (353)
दर्द भरा इस जीने में, हर पल मैं तो तड़प रहा
दर्द देते आया हूँ, है दर्द बाँट कर ही जाना
अजीब क्या आदत बनी, दर्द ना हो तो दर्द हुआ
अपने-पराये जुदा नहीं, काँटा हर एक से मिला
सवाल रहा हर संत से, क्या मौत समाधान दर्द का
जन्म हुआ तो दर्द भी, मौत कभी क्या हल हुआ
मोह जन्म की ना मिटी, जनमो में फंसता गया
ना दर्द है ना जन्म भी, पूर्ण प्यार जब इंसान बना. (354)
दुनिया की यह रीत चली, सिर्फ बचपन में इंसान मिला
शब्द ना निकला जिस दिन तक, ढेर जहान से प्यार मिला
ना हिन्दू था ना ब्राह्मण था, ख़ुशी का बस वह रूप ही था
कतार लगी नकाबों की, नफरत बना दुनिया से भिड़ा. (355)
विकास हुआ है दुनिया में, यंत्रो का खूब निर्माण हुआ
अहंकार में चला इंसान यूं, बिन उसके जग बेकार कहा
शहंशाह को भी भूला दुनिया, जिस पल उसका सांस थमा
क्रोध, लोभ ना छूटा जग से, सच्चा विकास तो दूर रहा. (356)
धर्म है मेरा, जात भी मेरा, जन्म पे मेरी मर्ज़ी कहाँ
राह और राही है अलग, मंज़िल तो सबकी एक यहाँ
सींचा है रस्ता धर्म जात ने, हर एक का अपना रस्ता
प्यार से चलू राह पर अपनी, गैरो से नफरत क्यों भला. (357)
देश है सबका ज़रा समझ ले, धर्म से तेरे ना गिला,
रंगना है एक रंग से हमें, जात भी रखना दूर यहाँ
देश बनी है धरती से, हर रंग के फूल खिले जहाँ
दुश्मन खड़े इंतज़ार में, झगड़ना नहीं आपस में यहाँ. (358)
वक़्त का सितम रहा, बिन कहे चला चला
बह गया यूं धार सा, संभला तो तनिक भी कहाँ
सुख दुःख बस ले चला, क्षण भी रुका ना यहाँ
चक्र है ये वक़्त का, ख़ुशी मिली जब ना बंधा. (359)
खूब लड़ लिया दुनिया से, खूब जी लिया इस जग में,
लक्ष्य यहाँ पर हर पल घेरे, जुनून से रंगा खुद को मैं,
पचास गुज़रा एक क्षण में, बेमतलब हर जीत कुछ वर्षों में
बाँध लू पेटी सफर शुरू ये, मिलने चलू अब खुद से मैं. (360)
ज़िंदा रखती है चाह यहाँ, नए जन्म की राह खिंचे,
जन्म का हर पल तड़प रहा, मौत से कैसे दूर रहे,
एक ख्वाइश है भगवन से, मुक्त हो जाऊं हर मोह से
मरने से पहले ऐसी मौत हो, की मरना एक मज़ाक बने. (361)
अपने और पराये लिए, दुनिया के महफ़िल में जिया
आधा सफर गुज़र गया, अपनों की पहचान ना सीखा
ज़रूर समझा एक बात को, दुःख हुआ जब दूजा माना
काश पहुंचू उस मंज़र पर गैर ना कोई हो जहाँ. (362)
पिंजरा है कहाँ, किसी को यहाँ पर रोक नहीं
कुछ ही लेकिन झुंड यहाँ, बचपन जहाँ है कायम सही
छोटी बातें, झगडे कई, नज़र से गिरने का डर नहीं
उड़ा परिंदा किस कष्ट से, झुंड को तनिक ना नष्ट रही. (363)
बचपन था बड़ा मधुर, धर्म और राजनीती दूर कहीं
दिल से दिल को जोड़ा था, जीवन भर के रिश्ते कई
ज़िन्दगी का अब है खबर, रिश्तों में रोज़ दरारे नयी
फिर जुड़ना है टोली अगर, नेता धर्म की बातें कभी नहीं. (364)
जीते मर्ज़ी से अपनी सब, सौ करोड़ के लोग यहाँ
मरू से झूमे मणि तक, हिम से सागर तक महका
एक डोर है सनातन धर्म, बाँधा सबको आज यहाँ
नास्तिक आस्तिक जो भी हो, धर्म को ना कोई फरक रहा.
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, कुछ ही समय से बात बना
शुरू नहीं और अनंत सनातन, प्यार का धर्म सदा से रहा
रीत ब्रह्माण्ड का सनातन धर्म, मोक्ष ही बस लक्ष रहा
परंपरा यह भारत का गर्व, आपस में ये झगडे क्या.
हर रस्ता है सर आँखों पर, मंज़िल तो सबकी एक यहाँ
नदिया गल गयी इक सागर में, दूजे राह से क्यों हो खफा
टुकड़े हो रहे दुनिया के, विज्ञान भी कुछ हार गया
प्यार का धर्म इस देश का भेंट, मन्त्र सिर्फ एक भविष्य का. (365)
डर और चाह की रीत यहाँ, जन्मो में कैसे फंसता रहा
दलदल में ही ढूंढा हल, और अंधेरो में डूब चला
एक नाम का मन्त्र बना, कह दे उसको जो भी यारा
जन्मो से बस दूर हुआ, अनंत ख़ुशी का रूप बना. (366)
फिसल रहा है दुनिया रोज़, प्यार का इज़हार कम हुआ
घबरा के बैठा इंसान यहाँ, नफरत हर ओर से नाच उठा
कुछ प्यार दिखा के है डरा, शायद ज्यादा तो ना हुआ
एक बूँद रही है बात तेरी, सागर विशाल है प्यार जहाँ. (367)
आधा सफर है कट चुका, कुछ और कदम है अब यहाँ
एक बात दुनिया में सीखा, कण तक मुझसे ना बदला
आधे रिश्ते, अधूरे स्वप्ने, आधा ही हर खेल रहा
खुद को पर मैं बदल सकू, यह मौका तो अटूट रहा.
दर्द उठता है सीने में, गलतियां अपनी देख यहाँ
शायद और भी होने है, ना रोना अब उन पर यहाँ,
नफरत दिल से निकल सके, उम्मीद बस एक रहा
बिखरे ना अब कोई शिकवा, खुद को पहले माफ़ किया.
खूब बातों से अनजान रहा, कुछ बातें पर जान गया
प्यार की भाषा अलग सदा, आस्तिक नास्तिक ना फरक रहा
कौन रूप में कहाँ से महका, पता ना इसका कभी चला
हर उलझन का उत्तर प्यार सदा, नफरत भी चकना चूर हुआ.
आधा सफर का पूरा सन्देश, मेरा सफर तो मेरा रहा
फिर जीने की ना हो वजह, लक्ष जीवन का एक यहाँ,
इस पल ही अब जीना है, अतीत और भावी झूट रहा
अब ना करना किसीसे बैर, प्यार का मन्त्र ही पूर्ण सदा. (368)
दोस्त कितने दूर हुए, बचपन तो यूं ही पिघल गया
अपने मुश्किल से अब दिखे, आग ही रिश्तों में मिला
धुंधली यादों की महफ़िल में, महक दोस्तों का ज़रूर उठा
यार पुराने बस सच्चे थे, हँसी में उनके ही जन्नत था. (369)
राहे बनी इतनी सुन्दर, रंगीन हर दीवार सज रही
विदेश से मेहमान आया, या मंत्री की जब टोली गुज़री
एक रात की बात मगर, मुर्दा दुल्हन सी सज गयी
सुबह का रोशन हुआ, हर राह और रंग बस चूर हुई. (370)
अच्छा बुरा क्या रहा, नज़रों का बस यह अंदाज़ है
धर्म की है ना बात यहाँ, राजनीती तो कोसो दूर है
इंसानियत की बात मगर, जानवर पर तो डरे से है
सच्ची बात है क्या यहाँ, ब्रह्माण्ड तक दिमागी वहम है. (371)
कैसी होगी भविष्य जहां की, कौन उसे तो देखा है
इतिहास की बातें क्यों हुई, किसने यहाँ पर जाना है
आज और अभी है रही सच्ची, यह पल पूरा अपना है
झूम ले बस इस पल में तू, बाकी मन का सपना है. (372)
दूर चला इंसान यहाँ, अलग ही रास्ता नाप लिया
दीवारों से झगड़ रहा, अपनों का ना नाम रहा
सूना पाया खुद को जब, कुछ देर हो गयी बात ज़रा
अकेला था आया दुनिया में, अकेला दुनिया से चल बसा. (373)
मंदिर मंदिर दर्शन किया, भगवन अपना ढूंढ रहा
तीरथ करूँ क्यों मैं इतना, समझ से कोसो दूर रहा
रिवाज़ो पर हॅंस भी दिया, थाम कर हाथ दुनिया का
मूरत अचानक बनी आईना, सदा से मंदिर घर ही था. (374)
सीख रहा हूँ काफी कुछ, हर दिन नया ही सीख दिया
एक बात पर सीखा पक्का, ज़बान से सच्चा धन ना रहा
कर ले बात मीठा सा, दिल से निकले पर बात ज़रा
चूमे कदमो को समस्त जहान, ग़ुलाम हुआ इंसान तेरा. (375)
क्रोध-मोह है सच्चे दुश्मन, सदियों से इंसान झूझ गया
दूर रहा है हर पल चैन, बार बार मरता ही गया
ढूंढा पागल सा महा मन्त्र, प्यार सदा तो दिल में था
एक बार बस मुड़के देखा, हर गम और जनम चूर हुआ. (376)
भारत की हर रिवाज़ को नीच कहा
ग़ुलाम था देश, हर बात मानता गया
अनचाहा मालिक एक दिन निकल गया
बचा ग़ुलाम लेकिन देश को तोड़ रहा.
इतिहास को बस झूट ही साबित किया
चरित्र पे हँसा, कभी था ही कहाँ
पाश्चात्य सिद्धांत को सर आँखों पे लिया
भूला हज़ारो साल से हमने यही बात किया.
खोकला माना इस देश को इतना
झोली फैलाना भी मुनासिब समझा
देश के खातिर, आवाज़ ना सहन हुआ
दुश्मन से मिलकर, देश को छोटा किया.
दुश्मन घेरे है चारो ओर से यहाँ
दोस्तों की मुश्किल से पहचान यहाँ
खुद लड़ेंगे हर दुश्मन से अब यहाँ
घर के दुश्मन पर सबसे खतरा जहाँ.
दया दिखाया था और देश नीलाम हुआ
इतिहास इस बात का गवाह रहा
गलती ना होनी है फिर दुबारा
पतन हर दुश्मन हो, बुलंद फिर से होना यहाँ. (377)
जो मिल गया वह सर आँखों पर
जो ना मिला वह था ही कहाँ
ना है तेरा कुछ भी यहाँ पर
पल यही है सच, बाकी सब धुआं.
कीमत क्या रही तेरी यहाँ पर
सदियों से दुनिया तो चलता रहा
रोया ना दुनिया तुझ बिन यहाँ पर
मक़सद तेरा तो कुछ और यहाँ.
अपने पराये से झूझा यहाँ पर
है सब कुछ एक भ्रांत जहाँ
दिल में छिपा है सच यहाँ पर
दीवार दिमाग का जूनून रहा. (378)
नफरत ही अब बरस रहे, घने बादल ना दूर हुआ
प्यार कही पे छिपा यहाँ, कभी कभी कुछ झाँक रहा
यंत्र भरे है दुनिया में, आसान क्या खाख़ जीना हुआ
शिकवे गिले कुछ ही थे, अपनों का ज़माना तो बीत गया. (379)
अपनेपन का नाम नहीं, झगड़ो में वक़्त गुज़र गया
जगह नहीं है प्यार की, नफरतो से दिल जो भर गया
आगे चलने की बात यहां, अब तो बस मज़ाक हुआ
मंज़िल दूर दिखे ना राह, हर कदम सौ तूफ़ान मिला. (380)
क्या हो रहा है दुनिया में, इच्छा हुई तो नज़र लगा
इंसानो की हार-जीत पे, ताली बजा या आंसू बहा
क्यों होता पर सब यहाँ, फ़िज़ूल तेरा यह सवाल रहा
खुद को जब तक ना जाना, जवाब तो कोसो दूर रहा. (381)
क्यों झगडे इंसान यहाँ, दो दिन का जीवन खेल रहा
रंग-भाषा और जात-धर्म, हर बात से कैसे बिखर गया,
राह और मंज़िल है मेरे अपने, औरो से मुझको क्यों गिला
भाई से लड़ा ज़ोर से इतना, घर का हर ईंट नीलाम हुआ. (382)
लड़ना नहीं अब इंसानो से, दुनिया से है रहना दूर
खूब जी लिया इस जग में, दर्द हुआ ना एक पल चूर
चलकर मिलना है खुद से, कभी ना था जो मुझसे दूर
मोतियाँ लिए हाथों में, भीख मांगता चला था मूढ़. (383)
गुज़रे साल कई जीवन के, वही बात दोहराते है
कदम उठे जब नए साल में, संकल्प हज़ारो भरते है
एक भी जब ना ही बने, बेचैन मन कुछ रोता है
हर दिल को अपना कह सकू, एक इरादा बाकी है. (384)
हर इंसान की कहानी है, कुछ तो हर से सीखा है
सलाम मेरा तो सब को है, युद्ध में हर एक झूझा है
बैर नहीं आज किसी से, किसी से ना ही शिकवा है
उम्मीद एक पर दुनिया से, मेरा राह भी सच्चा माना है. (385)
मंज़िल का पता नहीं, और राहें दलदल सी
सूरज छिपा है कहीं, और मौसम रहा तूफानी
छूटा हर हमसफ़र, बचा ना कोई साथी
आशा कुछ तो पर, ले चला जीवन की गाडी. (386)
प्यार किया है दुनिया से, अपनों को पर भूल गया
दूर रहकर अपनों से, दुनिया में सौ नाम लिया
जीत जगत के कुछ ऐसे, मतलब जिनका ना रहा
धिक्कार विजेता वो रहा, घर में जो लेकिन हार गया. (387)
जो करना है वह कर ले यारां
दो घूंट लगा और खुल के जी ले यारां
सदियों से अच्छे बुरे का चला है चर्चा
जाम के ख़ुशी को सोच से क्यों मारा. (388)
कुछ ना बदला दुनिया में, सब कुछ तो वही रहा
धर्म-जात से मरे थे लोग, आज भी मरते रोज़ यहाँ
बर्बाद कई अय्याशी से, इतिहास से सीखा कौन यहाँ,
कानून यंत्र नए है जग में, इंसान तो लेकिन उठा कहाँ. (389)
मेरी बात से तू बदल सके, या मैं तेरी बात से
रिश्ता अगर वही रहे, आंच ना गिरे आँचल पे
ठेस ना लगे दिल पे, ठंडी आहे ना रहे दर्द के
झगड़ा तब ही तुझ से, वर्ना जी ले हम मर्ज़ी से. (390)
उदास यहाँ पर हर एक चेहरा, झूट सिवा तो कुछ भी नहीं
अकेलापन में फंसता चला, दुनिया को लेकिन छोड़ा नहीं
नफरत के शोले जग पर छोड़ा, अपनी जगह से हिला नहीं
बढ़ रहा क्या खाख यह दुनिया, ख़ुशी का तो नाम नहीं. (391)
हर गलती दिल से माफ़ करे, नयन से आंसू दूर करे
ख़ुशी में तेरा साथ दिए, वक़्त पे दुनिया से भिड़ लिए
ज़बान बिन लगाम चले, ना आँख से गिरने का डर रहे
साथ कभी ना छोड़ उनके, खुदा के बन्दे कुछ दोस्त रहे. (392)
जानवरो से करे प्यार, या रखना जबान पर है
मर्ज़ी से जी ले सब, किसको यहाँ पर रोक है
दर्द गर ना इंसानो को, इंसान कहे रीत हर सही है
पहचान सच की बड़ी मुश्किल, खुद को जब ना जाना है. (393)
जो कहना था वह कह लिया
जो सुनना था वह सुन लिया
दुनिया ना बदला, मैं भी वही रहा
खामोश अब मुड़कर खुद से है मिलना. (394)
दर्द में ही मैं रहता, चुप रहकर पर अब है जीना,
दर्द में झूमा हर बंदा, वक़्त किसको जो बात सुना,
कह ले दिल को अपनी बात, यही बस अब ठीक लगा
सुना भगवन दिल में रहता, कन्धा शायद सदा यहाँ. (395)
वो दिन कभी तो आयेगा
जब कली कली मुस्कायेगा
इंसान ना डर से जी लेगा
वो दिन कभी तो आयेगा.
धर्म पे ना कोई मारेगा
हर दिल अपना बन जाएगा
दीवार हर एक टूटेगा
वो दिन कभी तो आयेगा.
निर्बल की आँख ना भीगेगा
जात से कोई ना तड़पेगा
शर्म से भ्रष्ट छुप जाएगा
वो दिन कभी तो आयेगा.
पालक देश ना तोड़ेगा
हर भाषा मेरा कहलायेगा
सोने की चिड़िया देश बनेगा
वो दिन कभी तो आयेगा. (396)
सिर्फ एक बार जीवन में मरना
पल पल मरते क्या ये जीना
हर पल जन्नत जब मैं समझा
सच में सीखा मैंने जीना. (397)
देश को क्यों बदनाम करे
बेशर्म अंग्रेज़ो की तारीफ़ करे
इतिहास को कैसे भूल चुके
हम को जो बस नंगा लूट चले.
राम कृष्ण की जब बात करे
कहानी कहकर हँसते बने
नाइंसाफी के जब मिसाल उठे
सीता द्रौपदी पूरा सच बने.
वितर्क से भारत को अपमान करे
टुकड़े हज़ारो देश के क्यों करे
युवा काश आज के समझ सके
एक हुए तो हमसे ना कोई बड़े. (398)
एक बना दो देश को यारों
देर कही ना हो जाये यारों
पिटना नहीं है अब दुनिया से
चोटी ओर चल कदम उठादो.
भाषा, रंग, जात, धर्म से
नहीं बटना है आज किसी से
एक देश है, एक लोग है,
ज़ोर से कह दे हम दुनिया से
राजनीती को दुत्कार चले
पत्रकारों से दूर रहे
प्यार सदा था देश का मन्त्र
एक होकर चल जय हिन्द बोले. (399)
कर्म तू धर्म से करता जा
किसी को ना कुछ फरक पड़ा
तसल्ली मन का सिर्फ तेरा
दुनिया को तुझ से मतलब कहाँ.
चुप होना बस सीख जा
और ना कोई मन्त्र यहाँ
तुझ बिन गर कुछ आंसू टपका
जीना तेरा कुछ सफल हुआ. (400)
सिर्फ मैं ही मैं हर तरफ रहा
दुनिया में क्या कोई गैर बना
खुद से मैंने किया प्यार इतना
हर गलती तेरा बस माफ़ किया. (401)
मंज़िल की आस कुछ ऐसी रही
जूनून में सांस तक लिया नहीं
दौड़ में ओझल दोस्त और साथी
हर जीवन कहानी रहा यही. (402)
अकेला था आया दुनिया में, अकेला यहाँ से निकल चला
भ्रम क्या है साथियो का, सफर भी सूना ही रहा
खेल सब व्यर्थ यहाँ, बदला तनिक ना मुझ से जहाँ
फँसा अपने और मंज़िलो में, खुद से कितना दूर हुआ. (403)
बीता पल ना वापस आया
बीता कल तो दफ़न गया
अतीत था बस एक झूठा सपना
यादों पर क्यों तू कुर्बान हुआ. (404)
हर दर्द को तेरा, अपना ही कहा,
हर ख़ुशी में मेरे, ना तू कभी जुदा,
चित्र दोनों का, एक रंग से था रंगा,
दुनिया से मिलकर, क्यों आज बदनाम किया. (405)
अनजान मंज़िलो को ऐसे दौड़ा
हर मोती राह के छोड़ दिया
भूला है इंसान अब जीना क्या
की मौत से पहले ही मरता गया. (406)
नफरत की जगह रहे ना वहाँ
औरत आँख से जल ना गिरा
बूढ़ा जहाँ पर खुल के हँसा
घर का पता बस यही रहा. (407)
भ्रष्ट कैसे देश भक्ति की परिभाषा
राष्ट्रगान को क्यों अपमान समझा
वन्दे मातरम मत विरोध कहा
निजी अधिकार पर हमला जाना.
देश आज टुकड़ो में ऐसा टूटा
दुश्मन की अब ज़रुरत कहाँ
वितंड बातों से दिल ना बेहला
देश है माँ, जय हिन्द बोल ज़रा. (408)
हालात दुनिया को कुछ ऐसे रहे
जूनून कई बार मन को घेर चले
परख नहीं देख रूप और रंग
बुरे शख्स तो शायद कुछ ही रहे. (409)
सच्चाई एक धर्म रहा, मतलब नहीं है पेशे से,
ईमान तो पहचान रहा, रिश्ता ना कुछ दौलत से,
दुनिया सिर्फ बहाना है, निर्बल मन को तसल्ली दे,
कुछ ही है बलवान यहां, जो सच्चाई पर जान भी दे. (410)
छोटा जीवन टेड़े रस्ते, पेशा बड़ा ही मुश्किल है
गंभीर हुआ कुछ जीवन ऐसे, हँसना तक तो भूले है
ज़माना अब की कहते सब, सुनता शायद कोई ना है
जो चलता है वो चलने दो, ठीक लगा वह चुनते है. (411)
माफ़ कर दुनिया को, जब सेज़ पर नींद को लेटा है
साफ़ दिल से जग स्वागत हो, उठकर जब सूरज देखा है
राज़ यही बस जीने का, बाकी हर मन्त्र अधूरा है
तड़प ना दुनिया बदलने को, खुद को यहां बदलना है. (412)
है नहीं आज झगड़ा, तेरी कोई बात से
है दूर ज़िन्दगी तेरी, शिकवा नहीं तुझ से
युद्ध उठे हर मुद्दे पर, दुनिया की राहों से
मुद्दा नहीं लेकिन कोई, बढ़कर इस दोस्ती से. (413)
हर सवाल का तेरे, जवाब शायद है पास मेरे
सवाल मेरे भी कितने, जवाब जिनके ना मिले
बड़ी है पर दुनिया, हर विचार को जगह मिले
चुप चल कुछ बातों पे, दोस्त से कहीं रिश्ता ना टूटे. (414)
क्या दर्द रहा क्या ख़ुशी रहा
क्षण में हर रंग है लुप्त यहाँ
ज़ुनून में क्यों तू घूम रहा
सिकंदर भी हुआ है भस्म यहाँ. (415)
होना हो जो, हो के ही बस रहना है
किस्मत या कर्म, नाम कुछ भी होना है
स्वीकार या इंकार, फरक ना कुछ हुआ है
दिल तरफ उठा कदम, मर्ज़ी सिर्फ एक यहां है. (416)
जो करना है वह करता जा
अपनों के दिल पर ना ठेस लगा
दुनिया खातिर जान भी छूटा
छोड़ नहीं पर हाथ अपनों का. (417)
रंग रूप में फँसी है दुनिया
चेहरे पे दुनिया ग़ुलाम हुई
हर भूल सुन्दर का माफ़ हुआ
बेईमान दिल तक क़ुबूल हुई. (418)
हिन्दू बना मैं ब्राह्मण बना,
अन्याय सदियों से सहन किया,
चुनाव अब है जो आने वाला.
दलित हूँ मैं, देश ने सिर्फ लूटा,
मुस्लिम को हिन्दू से है बचना,
खतरे में येशु का हर एक बंदा,
चुनाव अब है जो आने वाला.
भाषा मेरा है दबा हुआ,
द्रविड़ो को अब एक है करना,
उत्तर-पूर्व देश का था कहाँ
चुनाव अब है जो आने वाला.
देश के टुकड़े लाखो यहाँ,
डर और ख़ौफ़ ही मुझ में जागा,
रक्षा में मेरे खड़ा है नेता,
चुनाव अब है जो आने वाला.
राजनीती से देश है हारा,
देश का नाम ना कहीं रहा,
भारत का हूँ, भूला मैं सारा
चुनाव अब है जो आने वाला. (419)
कर्म कर ले दिल से तू, फल की इच्छा ना बना
क्रम रहा ये सदियों का, इंसान पर बेहरा चला
सांस को भी वक़्त क्या, चला चला है वीर सा,
सांस छूटा एक दिन, दो आँख ना भीगा है यहाँ. (420)
ना शुरू है ना अंत है
ना राह कोई ना मंज़िल है
सब यहॉं बस फेरा है
अंत सिर्फ आरम्भ है. (421)
हर रंग जहां में खुल के मना,
बस दो पल का है खेल यहाँ,
शोर उठा या ख़ामोशी, सूनापन या भीड़ हुआ
होली बना रोज़ यहाँ, हँसते हुए निकल ज़रा. (422)
पकड़े गए तो चोर बने
बच गए तो दुनिया सारी
हर पेच जायज़ इन रास्तो में
पैसा ही अब खुदा है सारी. (423)
खूब जहां में भटक रहा
ख़ुशी की चाह में तड़प गया
जाना आखिर राज़ यहां
चाह नहीं तो ख़ुशी सदा. (424)
मूर्ख इंसान क्यों झगड़ रहा
खूब यंत्रो से आवाज़ उठा
खुश हुआ की दुनिया सुना
किसी को पर क्या फ़र्क पड़ा. (425)
गम ना कर इस दुनिया का
किसी को तुझसे ना काम रहा
अकेला एक दिन है निकलना
नसीब गर तुझ पे दो आँख बहा. (426)
ख़त्म हो दुश्मनी दो घूँट से जिसके
बदनाम वो जाम है क्यों ज़माने में
माना हद से बड़े तो ख़ुदकुशी है
पर रेखा पार तो प्यार भी कातिल है. (427)
सुध बुध खोया इंसान यहाँ
नफरत ही अब बरस रहा
गुस्से में बहका हर कोई यहाँ
फूल तक अब अंगार बना
इस नफरत से निपटू कैसे
राह दिखे ना कोई मुझको
दुनिया से जुड़ना भी मुश्किल
दूर रहा तो ताने मुश्किल
बैर ना कोई गैर ना कोई
पहुंचू काश उस मंज़र पे
मंज़िल की चाह अब ना कोई
दस्तक दे दू अब दिल पे. (428)
गलती करे इंसान यहाँ, धर्म को क्यों बदनाम किया
भटका तो इंसान यहाँ, खुद को कैसे साफ़ कहा
राहे अनेक और मंज़िल एक, बात सब की एक यहाँ
उतरा राह मंज़िल छूटा, खूब पर मंज़िल झूट कहा. (429)
हज़ारो साल से देश चला,
कौन यह चरित्र मिटा सका
धर्म-जात तो है कल की बात
भारत तो दुनिया का मूल रहा. (430)
सदा ख़ुशी पर संदेह रहा
हकीकत हमेशा दर्द यहाँ
मूर्ख इंसान रोता ही रहा
दिल से ख़ुशी ना मना सका. (431)
नंगा है नाच राजनीती का
लुटेरों का है राज चला
वोट के वक़्त ही ज़िंदा प्रजा
जनतंत्र अब एक मज़ाक बना. (432)
मज़ाक होता है इस देश पर अक्सर
मौसम चलता जब चुनाव का हम पर
लुटा पांच साल अंधे धुन से जिधर
दाने ज़रूर मिलते मूर्ख को चुनाव पर
मौत का सामान सदा बदला यहाँ पर
फरक किसको हुआ, यहाँ पर मगर
क्या राजनीती यह, देश टूटा हर दिन सफल
लुटेरे ही सिर्फ चुना, धिक्कार इस चुनाव पर. (433)
क्यों फुदक रहा इंसान यहाँ
काम को अपने खुदा कहा
आँखें बंध तो दुनिया भूला
खेल तो सारा व्यर्थ रहा. (434)
लकीर खींच ले पथ्थर पर
हर जीवन की तड़प रही
नरम रेत के अक्षर पर
लहर एक सब साफ़ हुई. (435)
दे दे मुझे वह बचपन की यारी
राजनीती जहाँ बस गायब थी
दे दे मुझे वह कांच के गोली
धर्म जात की जहाँ बात ना थी.
रिश्ते बने रोज अब दिमाग से
जूनून एक रहे तो दोस्त बने
दिल को देखू अब दूर से
कागज़ का नाव तो बहते चले. (436)
लूट से चलता है आज ये देश मेरा
आईना तो देखा ना, सब को चोर कहा
बेईमान खुद, और दुनिया पर रोता रहा
राजा प्रजा क्या, लूट में सब आज मस्त यहाँ. (437)
वक़्त बह गया कुछ ऐसी थी तेज़ी
संभला बस थोड़ा और उम्र गुज़र गयी
देख कर उन्हें एक दिन, आवाज़ थी रुकी
आवाज़ खुली पर जब, दुनिया तो बदल चुकी. (438)
सूनेपन में मिली क्या, तनिक भी ख़ुशी,
अकेले पर चला चला, हँसी तो भूली
अजीब दुनिया की अब है रीत चली,
अपने दूर हुए और अंजानो से दुश्मनी. (439)
दो राहें जीवन में सदा दिखा
एक में स्वीकार सब मन शांत किया
झगड़ो से भरा दूजा, अपनी बात किया
सूनी है दुनिया बस, दिल तो बेचैन रहा. (440)
तुम तुम ही थे जो ख़फ़ा रहे
हम हम ही है जो प्यार करे
अदा आप की बस यूँही रूठे रहे
चेहरे बदलने में हम भी ना कम रहे. (441)
प्यार में दर्द है ज़रा ज़रा
बात से है इंकार कहाँ
प्यार पाक है पर समझ ज़रा
मोह बना है दर्द यहां. (442)
शिकवे करता क्यों रोज़ यहॉं
दो दिन का जीवन कहानी रहा
हर पल जी ले कुछ ऐसे तू
क्षण क्षण मिले ब्रह्माण्ड यहाँ. (443)
नींद और सपनो से उठता हूँ
दुनिया में आँख खोल चलता हूँ
और भी गहरी नींद दुनिया जाना हूँ
जागने की आस में अब रहता हूँ. (444)
क्या है सच और क्या है झूट
कौन इसे अब जाना है
हर ख़बर यहाँ पर ज़ालिम है
मासूम का सर रोज़ कटता है. (445)
क्यों चीख़ता और चिल्लाता गया
दुनिया तो बस वही रहा
कदम तेरे चुपचाप बढ़ा
सफर तेरा यह खुद का रहा. (446)
गलती करे इंसान यहाँ, धर्म को क्यों बदनाम किया
भटका तो इंसान यहाँ, खुद को कैसे साफ़ कहा
राहे अनेक और मंज़िल एक, बात सब की एक यहाँ
उतरा राह मंज़िल छूटा, खूब पर मंज़िल झूट कहा. (447)
कब्र की ओर है कदम बड़ा
रफ़्तार ज़िन्दगी का चलता चला
जीने की चाह में मरता चला
बस दूर ना कर दोस्तों को ज़रा. (448)
आधा उम्र तो गुज़र गया
कुछ दिन बचे है और यहाँ
सूना है घर अब शोर कहाँ
चाह मंज़िलो का नहीं रहा.
धीरे जहां में ओझल हुआ
अहमियत ना अब कोई रहा
गायब एक दिन ज़रूर हुआ
अगले क्षण दुनिया से भूला.
तेरे राह से क्यों है शिकवा
धर्म है अपना राजनीती अपना
अलग राह पर देश सभी का
हमसे अफ़सोस जहां ना बदला.
झगड़ा और यह लड़ना क्या
भूले चेहरों पर गुस्सा क्या
हमसे से क्या है फरक पड़ा
साथियों को अब गले लगा.
धर्म राजनीती दिल से उड़ा
बचे दोस्तों को सर पे बिठा
दवा से चलती जीवन यहां
भूल दुश्मनी हंस ले ज़रा.
कसम है मासूम बचपन का
गैर नहीं कोई बैर यहाँ
हर साथी तो है खुदा रहा
हर ठेस को मैंने माफ़ किया. (449)
किसी राह पर, कुछ मोड़ पर,
कदम थे हमारे साथ पड़े
अलग हो गए कुछ रस्ते आज,
मंज़िलें हुए है नए नए
मिले पर हमसे कुछ ऐसे आज,
टुकड़े दिल के हज़ार हुए
दौड़ तो हमारी भी रही आज,
यादों को काश दो पल दे सके. (450)
खूबसूरत है चेहरा वही
हँसी से सदा जो खिल उठी
राज़ ना कोई और रही
मुस्कान नहीं तो कुछ ना सही. (451)
हर कोई जब है संघ बैठा
कुछ पल साथ की रही आशा
एक बात ही मुँह से निकला
माफ़ी दे यार आज वक़्त कहाँ.
खाली है अब महफ़िल यहां
हर साथी मुझसे दूर चला
बंदिश नहीं आज कोई वक़्त का
अपनों को पर अब ढूंढ रहा.
एक दिन ज़रूर है बुलावा
उम्र की रफ़्तार ना कम हुआ
एक ही गलती पर आँख बहा
क्यों कहता रहा की वक़्त कहाँ. (452)
दो इंसानो से शहर यह महक उठा
जोड़ी यह लाखो का भगवान् बना
वृक्ष कह दू या कह दू समुन्दर
हर उपमा तो काश है फीका पड़ा.
मेहनत से दुनिया को मिसाल दिया
पैसो से किसी का ना कभी मोल किया
सेवाऔर प्यार ही इनका मन्त्र रहा
यह जोड़ी तो करोडो में एक रहा.
छाया में इनकी हम बढ़ते चले
हर मुश्किल से होकर हम पार चले
सलामत रहे जोड़ी बरसो के लिए
हर पीड़ी के इनसे जीने का सीख मिले. (453) On Kodanda Rama Rao garu and Dr Anjani Devi
ना चाह कोई तेरे दौलत से
इज़्ज़त बढ़ाने की ना आस रहे
हसीन दो पल का साथ चाहिए
कुछ और ना मांगू दोस्तों से. (454)
प्यार किया जब प्रतिभा और चेहरे से
रेत के महल वो, क्षणों में टूट गये
अपना बनकर जब दिल से लगे
प्यार वह क़यामत तक अचल रहे. (455)
कौन मुझे अब रोकेगा
हर शंका दिल से दूर हुआ
इश्क़ तेरा जब हिम्मत मेरा
हर पत्थर राह का चूर हुआ. (456) Only for Ratna
है प्यार बसा दिल में सदा मगर
है सबसे गले लगने की आस मगर
राह और मंज़िल का पता साफ़ मगर
नफरत ने भुलाया हर रस्ता मगर. (457)
चेहरे पे दिल को क़ुर्बान किया
समय कुछ बीता और आँख खुला
मंज़िल छूटा और राह भी छूटा
तस्वीर को काश हकीकत समझा. (458)
चला दिल में लेके इतनी बंदिशे
बोझ हर कदम बदली ना किस्मतें
छोड़ा हर चाह और तोड़ी नफरते
राह और मंज़िल मुझमे ही थे बसे. (459)
मौन रहा जब प्यार और विद्या
मौन जब बिन इच्छा का दान रहा
मौन जब कर्म का सार रहा
उस मौन में सारा ब्रह्माण्ड बसा. (460)
कर्म किया है दिन में ऐसे,
नींद रात की प्यारी हो,
सोया रात को इस आशा में,
सुबह काम में ऊर्जा हो.
जीवन चक्र बस चलता ऐसे,
जन्मो से क्या भटके हो,
शांत वह पीछे खेल यह देखे,
थम कर देख ब्रह्माण्ड है जो. (461)
कुछ लोग काश ऐसे है यहाँ
खुद की बात हकीकत जहाँ
अलग बात गर सुन भी लिया
कहने वाला तो बदनाम हुआ.
चर्चा इनसे फ़िज़ूल रहा,
खुश आप में है वह रहता,
अपने सुख की कर ले चिंता
बाते गहरी इनसे ना करना. (462)
ख़ौफ़ हर पल तो घेरा है
दुनिया से सदा ही डरता हूँ
अजीब जूनून पर मन का है
हर सुबह उम्मीद से उठता हूँ. (463)
संसार का बस एक जीव दिखा
दुनिया जिससे बदल गया
धुन में काम तू करता जा
उपकार का वहम निकाल ज़रा. (464)
सुबह की क्या वह उम्मीद रही
रात की क्या वह दर्द रही
चक्र ज़िन्दगी की चलती चली
जागा और सोया पर चैन नहीं. (465)
अज़ीब कैसा जीवन का यह दौड़
खुल के हँसना भूले यहां एक रोज़
पाया क्या दुनिया में तड़पते अफ़सोस
मोती बचपन के जब हमने दिया छोड़.
मासूम थी ज़िन्दगी आज़ाद हर मोड़
छल कपट ना दिखी किसी भी ओर
धर्म राजनीती से अनजान हर जोड़
मोती बचपन के हमने दिया क्यों छोड़. (466)
अंगारो पे चलता रोज़, दुनिया से यूं झगड़ लिया
इंसानो से मिला नहीं, दूर प्यार से चलता गया
भूख रही है दुनिया की, हर पल क्यों बेचैन रहा
एक पल तू निकल चला, झट से दुनिया भूल गया. (467)
सोता जागता चक्र में अजीब सा फंसा
कहता ही रहा इसको जीने की नशा
हर दिन तो है बस एक अधूरा सपना
एक रात पर है, गहरी नींद में जब सोना. (468)
गिरता ही रहा इंसान यहाँ
लोभ मोह से बंधा जहाँ
दुनिया पाने को दौड़ चला
और खुद से कैसे दूर हुआ. (469)
मौका मिला एक और यहाँ
दुनिया इतना ना क्रूर रहा
हिम्मत हारा तो सब कुछ खोया
पापी तक यहाँ पर मुक्त हुआ. (470)
सुना हर पार्टी का एक मुद्दा होता है
देश विकास का जहाँ नक्शा होता है
जीतने वालो से जुड़ा हारा नेता है
कौनसे विकास का मुद्दा यह होता है. (471)
हज़ारो गड्ढ़ो से रस्ते है सजे यहाँ
चाँद पहुँचा विज्ञान, रस्ते पर बेकार यहाँ
चाँद सा खिला रोड, मंत्री जब गुजरा यहाँ
हल्का बारिश का झोंका, कांच हर फूटा यहाँ. (472)
खुद के खातिर ही जीता रहा
मोतियों को बस बटोर चला
महाराज पर तू तभी रहा
हर मोती जहान को लौटा चला. (473)
बालो को रंग देना, कहाँ की है जवानी
सजते नहीं रस्ते नए, लेकर फूल पुराने
अंग है गलना, जीवन की अटूट कहानी
जोश हो हर सांस में, है वही सच्ची जवानी. (474)
कैलाश के उमंगो में बसा कहीं
श्मशान के शून्य में रहा वही
हर पल हर कण में अचल सही
बिठा के दिल में ढूंढे क्यों हर गली. (475)
दोस्तों को दिल से दुआ दिया
अपनों को खुल के गले लिया
जन्मदिन पर जब सबने याद दिया
हर रोज़ जीने का कसम लिया. (476)
कुछ बाँट चला, कुछ कर चला
राहों में कुछ कहता चला
भ्रम कितना की जी चला
चित्र जहां का कण ना बदला. (477)
मीठी बाते ही गर निकल सके
कुछ दर्द किसीका मिटा सके
खुद से दोस्ती गर अटूट चले
जन्नत हर कदम पर साथ चले. (478)
कुछ बात ऐसी रही दोस्तों में पुरानी
माँ की ममता से शायद कम ना रही
सिलसिले झगड़ो के बस अटूट चली
तरक़्क़ी तेरी लेकिन दिल में गर्व भरी. (479)
चेहरा सफ़ेद और बाल हो काला
नादान है उम्र का जूनून यहाँ
रंगीन कपडे तो खुद को है धोखा
बचे राह में मन धो ले ज़रा. (480)
राहो में दुनिया की भटकता रहा
मंज़िल ना राह का कुछ पता मिला
रुका जब एक दिन और खुद को देखा
मंज़िल था दिल में सदियों से भुला. (481)
तुम ना बदले, जग न बदला
क्यों मेरा कोशिश रहा
सब मिला जब खुद को बदला
छूटा है आज हर कशिश यहाँ. (482)
कदम भी क्या वो कदम रहे
तैयार राहों पर चलते चले
उन कदमो पर क़ुर्बान हुए
राहें नए जो बना चले. (483)
साक्षी है चाँद-सितारे, जोड़ी आज एक नयी बने,
साक्षी हम मेहमान रहे, है जो आज शाही बने,
सुबह तो आयेगा, यादें अनमोल रह जायेंगे,
दुआ है एक हमारी, रिश्ता सितारों सा बसा रहे. (484)
धड़कते है दो दिल आज, बनकर यहाँ पर एक,
सुंदरता का मिसाल देती है, जोड़ी जो बना एक,
हसीन रात, खुश इंसान, जन्नत आज दिखा एक
पल बस यह थम जाये, ख्वाइश रही है हमारी एक. (485)
बदल सका ना अपनों को
बदल सका ना दुनिया को
कोशिश तो है झूठा सारा
खुद बदला तो सब कुछ जो. (486)
देखता ही रहाँ रास्तों को मैं
सुकून का पता कहीं तो मिले
मुझमे ही था सदियों से छुपे
रुक कर खुद में, ढूंढा ना जिसे. (487)
हर सीने में कितना दर्द बसा
तन या मन से सब टूटे यहाँ
सफर का मंज़िल तो धूल रहा
गलती सब है माफ़ यहाँ. (488)
क्यों तोड़ रहे हो हिन्दू को
सबको जिसने गले लिया
वर्ण-जात का दाग दिखा के
मैल खुद के ना देख सका. (489)
वेदोपनिषद तो अपना है
धर्म सनातन सबका है
हक़ किसी का ना ज़्यादा है
राजनीती से क्यों टूटा है.
क्यों दाग लगाये हिन्दू पे
गले ही मिलना जो जाना है
तड़प रहा है सदियों से
गाय और राम सिर्फ माँगा है.
वर्ण-ज़ात की बातें करके
हिंदुत्व शब्द को बुरा बनाके
एक लोग है, एक देश है,
नहीं धर्म पे आज जाना है. (490)
आग और नफरत तो होना ही है
कांटे तो राहो में मिलना ही है
दुनिया ना बदला, एक सा रहना है
ढख पैरो को, और राहो पर चलना है. (491)
ज़रूर एक रोज़ है फिर से मिलना
राहें अलग और मंज़िल है अलग
पर खुदा की मर्ज़ी कौन है जाना
कभी अलविदा ना ही कहना. (492)
देख मां बेटी हर नारी में
और ना कोई उपाय यहां
मोक्ष का रास्ता है कठिन जहां
मोह को पहले दूर हटा (493)
करोडों का ना वो मालिक है
लाखो दिल पर ना छाया है
बस तन मन से अपनाया है
पिता ही सबसे बड़ा नायक है (494)
पहला ना रहा तो कही और ही सही,
तेरे हार से ही तो किसी की जीत हुई,
जोश हो खेल का, हार जीत का गम नही,
वक़्त में हर खेल खत्म, हक़ीक़त बस एक रही. (495)
कुछ छोटे ही रहे हाथ मेरे
सागर तो विशाल ठहरा है
नन्ही सी सोच है यार मेरे
थोड़ा सा प्यार कहाँ होता है. (496)
इस पल मे जीना छोड दिया
अतीत और कल में झूझ गया
हंसी को कल पर कुर्बान किया
और आज तू मूर्ख सा रोता गया। (497)
जीता दुनिया की हर बाज़ी को,
पा ही लिया तूने हर सपने को,
मतलब ना दे इस बूंद सी जीत को,
जब घर ढूँढे तेरे वक़्त और प्यार को। (498)
किसी मौत से जग ना रुका कभी,
कोई जन्म से जग क्या शुरु कभी,
कर्म करता जा, गर्व ना हो तुझे कभी,
मंजिल और ही रही, दुनिया तो रेत सही। (499)
अधूरा इश्क़ आधे सपने
कहानी तो सदियों से एक रही
पूरा इश्क गायब हो सपने
मोक्ष का वादा सदा ही भूली। (500)
माफ किया और भूला भी झट से
दोस्ती का एक सही पहचान रहा
हर कर्म में हम सिर्फ इन्सान रहे
दोस्त के इस रूप को भगवान कहां। (501)
आया था किसी दिन हम पर जो जवानी,
छूटा ना साथ कभी बन गयी मेरी कहानी,
पूँछ नहीं आज इस उम्र में क्यों रही मेरी दीवानी,
जवाब में कह दू की बूढा होगा तेरा बाप जानी. (502)
कुछ पहले कुछ बाद, मंज़िल सबकी आनी ज़रूर,
राह कुछ फूल पाकर, मंज़िल समझना है गुरूर,
अकेला ना है कभी यहां, लम्बा है सफर ज़रूर
ज़मीर तेरे साथ सदा, दोस्त कुछ पल के है सुरूर. (503)
कही से ना आया है, कही ना तुझे जाना है,
चित्र बदले हर पल, रंग तो एक रहा है,
सांस बढती ही चली, दौड को रोका नही है,
थम के एक पल जान ले, हर दौड आखिर फ़िज़ूल है. (504)
दान करके कुछ, दुनिया में ऐलान किया
नादान है तू, दान से किस्को है फ़रक यहां
फूल बगीचे के इधर से उधर माली ने किया
और सोचा की मालिक पर एहसान किया। (505)
उठना गिरना हक़ीक़त रही
धूप और छांव से जीवन बनी
सिर्फ हो जीत और सिर्फ हो सूरज
वो तो बस परियों की कहानी रही (506)
छल कपट से दुनिया चले
दूध से कोई ना धुला यहाँ
डरते ही रहे हम इस दुनिया से
और सब हमसे बस डरते गये. (507)
आशा की क्या यह दौड रहा
लाखो मोती राह के छोड दिया
हर मंज़िल तोड़ कर मंज़िल मिला
सब पाकर भी तू नंगा रहा. (508)
इमारते आलिशान ये, आंखो को चौंका रहे रोज़,
खडे है फ़ूटे रस्तो पर, कैसा अजीब मज़ाक रहा,
तवाइफ़ को आभूषण से ढख दिया हर रोज़,
तरक्की का देश का अफसोस एहसास रहा. (509)
बदनसीब कुछ, हर चाह जिनके सपने रहे,
कुछ हम जैसे, सपने कुछ कुछ जिनके पूरे हुए,
एक चाह बड़ी की पहुंचू काश उस मुकाम पे,
पूर्ण ख़ुशी में झूमूँ मैं, चाह की पर ना नाम रहे. (510)
दुःख और दर्द से कौन है बचा
हकीकत इसको तो मान गया
प्यार सदियों से पर मन्त्र रहा
इस हकीकत से क्यों तू दूर रहा. (511)
छोड़ के हर चेहरे को तू,
नज़र मिला खुद से तू
हर चेहरा सिर्फ था तू ही तू
भगवान् ही था सदा से तू. (512)
जब दर्द को हकीकत मान लिया
एक मुस्कान में जन्नत देख लिया
हर रिश्ता प्यार से जब भर दिया
मैंने तब जीना सीख लिया.
जब उम्र से डरना छोड़ दिया
हर काम को जोश से भर दिया
चले जब बच्चे तो ऊँगली छोड़ दिया
मैंने तब जीना सीख लिया.
जब मोह को कोसो दूर किया
हर दुश्मन मैंने माफ़ किया
और खुद से दोस्ती खूब किया
मैंने तब जीना सीख लिया. (513)
एक म्यान में तलवार दो ना रहे
इस बात से क्यों हम बेचैन रहे
दुनिया के खाली म्यान लाख रहे
ढूँढ थोड़ा सा, तन-मन को चैन मिले. (514)
झगड़ा अब नहीं कोई बात से तेरे
दुनिया तो सदियों से वही रहा
संत महात्मा कितने आये और गये
खुद बदलो यही उनका सन्देश रहा.
ज़माने के दस्तूर अब कुछ अलग हुए
कारवां तो मिले, पर साथ ना कोई चला
नए साल की बस एक चाह रहे
खुश रहे हम और तुम, शिकवा ना दिल में रहा. (515)
कर्म है अलग, धर्म है अलग
अंदाज़ जीने का हर एक का अलग
प्यार का एहसास पर कभी ना अलग
मन्त्र एक बचा आज़, हुए ना दुनिया अलग। (516)
कुछ बाँट चला, कुछ कर चला
राहों में कुछ कहता चला
भ्रम कितना की जी चला
चित्र जहां का कण ना बदला. (517)
मीठी बाते ही गर निकल सके
कुछ दर्द किसीका मिटा सके
खुद से दोस्ती गर अटूट चले
जन्नत हर कदम पर यही मिले. (518)
आज है नयी सुबह, हर पुरानी रात है छूटी,
नयी मंज़िले हर दिन, हर मंज़िल है टूटी,
मेहनत और हिम्मत की कभी ना हो कमी
आसमान ही चूमना है, यह बात कभी ना झूटी। (519)
ना बदले है हम, ना जग ही कभी बदला
वक़्त को मुफ्त क्यों बदनाम किया
माया ही रही इस जग के खेल का
हकीकत तो एक पल, बाकी सब सपना रहा. (520)
नाराज़ हुआ कभी अपनों पर यूं
रात की ख़ामोशी में रोया मैं भी हूँ
दूर ना जा एक मौका के काबिल तो हूँ
प्यार है वही पर एक इंसान ही तो हूँ. (521)
ना अंदर ही मैं देख रहा हूँ
ना दुनिया को भी देख रहा हूँ
यंत्रो से आज कुछ ऐसे बंधा हूँ
बाते तो खूब होती पर अकेला खड़ा हूँ. (522)
रात कभी तो जाना होगा
और रोशन सारा जग होगा
झूम के इंसान बस गायेगा
वह सुबह तो एक दिन आयेगा.
इंसान खुद को तो जानेगा
कोई गैर जहाँ ना टेहरेगा
हर सीमा दुनिया का टूटेगा
वह सुबह तो एक दिन आयेगा
हर जीव को इंसान अपनायेगा
रिश्ता धरती से फिर बांधेगा
नींद से गहरी उठ जाएगा
वह सुबह तो एक दिन आयेगा. (523)
दिल दिमाग का तनाव चलता ही रहा
इंसान हमेशा से ही गलती में रहा
रिश्तों का जड़ सदियों से दिल ही था
दोस्ती तो सोच से बिखरता ही गया. (524)
हटा जब नज़र हर चेहरे से
और नज़र मिलाई है खुद से
एक ही तो चेहरा सदियों से
आईने थे कई कौन जुदा था मुझसे. (525)
अकेले ही घर में उदास हो रहे
दुनिया के लिए आज है तरस रहे
सदा के तरीके पर अफ़सोस भूल चुके
दुनिया को साथ लेके कब थे हम चले. (526)
समानता का मंत्र दुनिया में चल गयी
एक रंग ही हर कोई को रंग दी
दस्तूर उनका तो ना था यह कभी
विशेष है हर एक, समानता बस यही रही. (527)
लड़ना नहीं अब किसी बात से तेरी,
जूनून नहीं सुनाने को भी बात मेरी,
रूठने मनाने में ज़िन्दगी गुज़र गयी,
दुनिया भी ना समझा, और खुद से दूरी हुई. (528)
तारीफ में कहने को बचा ही क्या है
हर सुन्दर शब्द जो उपयोग हुआ
कसम से पर तुलना सूरज चाँद का है
जीवन को खूब हमारे रोशन किया.
हम तो आपके बस आभारी है
जीने के अंदाज़ हमें जो सिखा दिया
रुके ना कभी कदम दुआ यह हमारी है
हर कदम जो नयी मंज़िल बना दिया. (529) ON THE 50TH ANNIVERSARY OF DR ANJANI DEVI PRACTICE
साधारण सी ज़िन्दगी रही
साधारण हर मंज़िल रही
चाह कितनी ही पूरी हुई
ख़ुशी पर काश अधूरी रही
गली ना कोई बाकी रही
बंधन हर बात से बेशक रही
नज़र जो एक दिन दिल पर गिरी
पूर्ण ख़ुशी तो सदा थी रही. (530)
कोई करे ऐसी बात की दिल जगा दे
दुनिया गले लगने की आग लगा दे
पर्दे और मैदान पर खिलाडी ही रहे
यह सच्चे नायक करोडो में एक रहे. (531)
राह और मंज़िल कभी थे ही नहीं
चंद खुशियों को मक़्सद बना दिया
अंदाज़ जीने का कुछ और नहीं
जीना है खुल के अभी और यही. (532)
जहाँ आँख से गिरने का ना डर रहे
जहाँ इज़्ज़त बढ़ाने की ना चाह रहे
खुद रहूँ और बातों का ना मोल रहे
दोस्ती है वहीं बाकी सब व्यापार रहे. (533)
रूठना भी दोस्ती है यारों और मनाना भी
झगड़ो की कमी तो नहीं दुनिया में कभी
एक ही तो महफ़िल दोस्तों की रही
जुबां खुल के चले पर डर रहे ना कभी (534)
पड़ोस तो सदा से दुश्मन ही रहा
पर अब यह दुनिया अज़ीब हुआ
अंजान चेहरे से भी भिड़ता गया
प्रगति पर चैन का बलिदान हुआ (535)
मौत पे आज कोई उफ़ ना करे
राहों पर अपनी सब चलते चले
प्रगति कैसा आज हम देख रहे
हंसना और रोना दोनों भूल गए (536)
जन्म का डर हो मौत से कभी नहीं
गुरु का सन्देश कुछ और ना रही
विपरीत रही पर मानव बुद्धि
डरते डरते लाखों जन्म में फंसती चली. (537)
सीखता रहा जीवन भर, बाते नयी पुरानी हुई,
आस इंद्रधनुष की, जो मिलने से दूर रही,
तड़प इक दिन अचानक दिल से ओझल हुई
इस पल को जाना जन्नत कही और ना रही. (538)
ज्ञान ख़ुशी कर्म क्या निख़र गया
मोह और ग़म पूरा बिसर गया
गुरु की नज़र एक मुझ पर गिरा
दुनिया का सितम हर दूर हुआ. (539)
यादों की महफ़िल में जलता ही रहा
पुराने ग़म और ख़ुशी में फंसता चला
भूला एक बात की दीपक तो मैं ही था
किरणों को ढूँढ़ते हुए तड़पता ही रहा. (540)
अज़ीब दौर ज़माने की अब रही
नज़रों में सब है पर दिल में कोई नहीं
दूर तक ख़बरें क्षण में पहुँच रही
साथ देने की बात पर कही ना रही. (541)
हर दिन तेरा यहाँ बस रोशन हो
हर पल तेरा यहाँ पर मोती हो
हंसी कभी तुझसे ना जुदा हो
जन्मदिन में खूब दोस्तों का गीत हो.
हर गम को धूल बनाने की हिम्मत हो
दर्द कोई भी दो दिन के मेहमान हो
हर वर्ष यह दिन और सुनहरा हो
महफ़िल में बस यह नाचीज़ का साथ हो. (542). December 7, 2020 Dr Ramesh birthday
घूमा एक दिन तू बादलों की बाहों में
खुश ना हो कुछ हसीन पल जो मिले
उड़ा आज तू जिन हाथों के तले
उन्ही के पाँव एक रोज तुझे है कुचले. (543)
डर ना हो जब मौत का
मोह ना हो जब जीने का
चाह ना हो कुछ पाने का
हर सांस ख़ुशी से झूम उठा. (544)
जो तोड़े हर चीज़ को, कई हज़ार टुकड़ो में,
वैज्ञानिक ही रहा या बन्दर मनुष के रूप में,
मिलते है कम, जो जोड़े हज़ारो को एक में,
एक देखे सब में, ईश्वर है वो इंसानी रूप में. (545)
छूटा गांव जिस एक दिन, कौन तुझे है पहचाना,
रोया कौन तुझपर दो पल, दुनिया ही जब छोड़ दिया,
दौड़ता रहा बेचैन, पर इंद्रधनुष तो दूर रहा,
काश समझता हर शोहरत तो, तुझमे में ही सदा जिया. (546)
हर किसी को दुनिया से नाराज़गी रही
दिल में दर्द सिवा कुछ और ना रही
सुलझना ये अंगारे मुश्किल ही रही
कहना है सबको पर सुनना किसीको नहीं. (547)
खड़ा हो किसी भी मकाम पर तू
मंज़िल कोई किसी भी राह में तू
साफ़ दिल और चैन से सोया है जभी तू
सफल ज़िन्दगी तेरी समझ यह बात तू. (548)
जो बीत गया किस्मत ही रहा
जो आएगा सिर्फ तेरा बना
इस पल को आग तू ऐसे लगा
रोशन कल और भस्म अतीत हुआ. (549)
अजीब यह उम्र की दौड़ चली
तन खाख पर मन उसी पर मरती रही
सपने ना छूटे जन्मो का दौर चलती चली
मौत से डरा क्यों जब खौफ जनम की रही. (550)
अकेले हो या भीड़ रहे
ख़ामोशी हो या शोर चले
पल पल ज़िन्दगी को रंगते रहे
की मौत भी ख़ुशी से चूमते चले. (551)
ना शुरू था ना अंत था
ना राह कोई ना मंज़िल ही था
चक्र ही था सब यहाँ
मोक्ष की राह कुछ और ही था. (552)
जग हासिल करने की आस में रोज़ जागता रहा
दौड़ा दुनिया में हैरान और लाचार ही रहा
समझा जब हर दिन खुद को पाने का मौका रहा
हर सुबह उस दिन से उमंग का समुन्दर बना. (553)
दर्द ना मिट सका कभी इस ज़िन्दगी में
हसीन हर वक़्त गुजरा दीपक की रफ़्तार से
मौत का अंत करने गिरा आदमी जाल में
परम ख़ुशी तो सदा छुपी इन जन्मो का अंत से. (554)
मोह के जीवन से दूर किया
मौत के डर से परे हुआ
इस पल को जैसे ही चूम लिया
जीना उसी दिन सीख लिया. (555)
कुछ बाँट चला, कुछ कर चला
राहों में कई बाते कहता चला
भ्रम कितना की खूब जी चला
बेवफा दुनिया तो कण भी ना बदला. (556)
AND THE LONG POEMS
ना देश है, ना भेष है
ना धर्म है, ना जात है
ना प्रांत कोई भाषा है
ना लिंग है, या रंग है
नाम दर्द का नहीं
सुख की कभी चाह नहीं
न धूप की पीड़ा रही
आशा छाओं की न रही
न चाह है, न द्वेष है
क्षणों का सुख भी नहीं
न दुःख रहा न डर ही है
संसार का दर्द नहीं
सच नहीं यह स्वप्न तो
सच नहीं कोई संत तो
गुरु कोई न शिष्य है
मंदिर नहीं न मन्त्र है
दिल दिमाग न रहा
भ्रान्ति है, एक माया है
न फंसा जाल में कोई सदा
सिर्फ एक ही तो नाम है
दूजा और न कोई हूँ
मैं हूँ, मैं हूँ,और मैं हूँ,
प्यार सिर्फ प्यार हूँ
ब्रह्माण्ड सभी तो मैं ही हूँ
पिता का सन्देश
व्यस्त था मैं दुनिया की राहो में
संघर्ष रहा खूब इन मेलों में
शायद कंधा न दिया या आंसू ही पोंछे
दिल तो धड़का है लेकिन तेरे ही लिए
दुनिया ने माँ को है पूजा
दिया है माँ को भगवान का दर्ज़ा
शक ना शिकवा है इस बात का
प्यार मेरा भी लेकिन उतना ही रहा
साथ रहे हम तेरे जड़ के नीव में
मिलकर दी ताकत दुनिया की दौड़ में
बहुत औज़ार ज़िन्दगी के माँ ने तुझे दिए
ज़िन्दगी मेरी भी लेकिन तुझे बहुत सीख दिए
तरक्की की आसमान को जब छूलोगी
अतीत के राहो को जब मुढ़ कर देखोगी
एक प्यारी माँ सदा यादों में रहेगी
खामोश पिता का प्यार लेकिन बहुत गूंजेगी
व्यस्त था मैं दुनिया की राहो में
संघर्ष रहा खूब इन मेलों में
छोड़ दे गाय और अयोध्या को
बन जाएंगे तेरे ग़ुलाम हम तो
हर धर्म और संत कहे एक बात को
मंदिर मस्जिद वही जहा है खुला दिल तो
दर्द है उठा इस देश के हिन्दू में
कभी न गम सबको गले लगाने में
बड़प्पन प्राचीन देश की संस्कार में
तू मेरा ही टुकड़ा चला अपने रस्ते पे
सहमत तेरी हर तमन्ना से
खुश हु तेरे हर जीत से
जी ले तू ख़ुशी के हर रंग से
रंगू मैं भी उस रंग के दो चुटकी से
है घर सबका जितना ही मेरा रहा
तोड़ दू हाथ जिसने और बात कहा
किसी ख़याल से तेरे शिकायत न रहा
इतिहास का वास्ता कभी न तुझको दिया
दो बाते दर्द दे इस दिल को
छोड़ दे वितण्ड की बातो को
कीमत न दे राजनीती की दुष्ट बातो को
और देख चूमू कैसे तेरे कदमो को
राम और रोहिणी बसे एहसास में
छीनना नहीं छोड़ दे इन्हे
नहीं कीमत तुझे इन्हे छोड़ने में
उठेगा आसमान तक हमारी आँखों में
आएगा देश में फिर वह प्यार
देश बनेगा फिर से महान
कोई दुश्मन करे सकेगा न हम पे वार
मिल के बनायेंगे देश को अव्वल जहान
वापस आजा अँगरेज़
क्यों छोड़ चले अँगरेज़ हम को
बर्बादी और लगी है हमको
एक ही था दुश्मन सबको
हर पड़ोस है दुश्मन अब तो
कुचले गोरो के शासन में
टूटा संस्कृति हज़ार टुकड़ो में
रोशन थी दुनिया भारत की तेज में
बने भिकारी डेढ़ सौ साल के अंधेरो में
अँगरेज़ गए तो आशा जागी
विशाल सा मूरत फिर उठने की
टुकड़ो से मूरत जुड़ने की
बना यह मूरत लेकिन अजीब सी
प्रांत भाषा धर्म जात है, भारत ही कही नहीं
महाभारत रामायण ने जोड़ा था देश को
धर्म से एक थे हम सब तो
हर गाँव से गुजरा राम -अर्जुन तो
जात पात से टूटा क्यों यह देश तो
अखंड था भारत , हटाने उस गोरे को
तोडा है लाखो में, आज माँ की मूरत को
तृष्णा में तड़पे, भिकारी सा हर मंत्री तो
खुदगर्ज़ी में कुचले वासी, राह चले हर राही को
रस्ते बनते है जेब भरने को
एक बारिश से टूटे टुकड़ो में जो
बंद करो बाते जीतने अंतरिक्ष को
बुनियाद नहीं लेकिन बनाये इमारतों को
हर विचार का राजनीती है देखा
कालचक्र में एक के बाद एक आते है देखा
देश का वासी मूर्ख कभी न समझा
लूट और विनाश का तरीका ही बदला
जागी देश के हर वासी में नफरत
पालक के चूल्हे है, इनसे ज्वलित
भिन्नता का हर रूप को करे इंसान द्वेषित
लाख युद्धों से देश हुआ कमाल का दहशत
क्यों छोड़ चले है अँगरेज़ हम को
बर्बादी और लगी है हमको
एक ही थी दुश्मन सबको
हर पड़ोस है दुश्मन अब तो
पागल प्रेमी
मूर्ख ढूंढे प्यार को मेहबूब के इकरार में
प्यार तो बसा हुआ संसार के हर राह में
बारिशो से है घिरा हर तरफ सिर्फ प्यार से
ढून्ढ रहा क्यों पागल सा नाले के मैले पानी से
माँ की हर रोटी में प्यार का मूरत बसा
बाप दिए पहले कदमो में अनंत प्यार है छुपा
हँसी में बच्चों की जन्नत ही हमें दिखा
ताल में संगीत के भगवान ने दर्शन दिया
रंग जब चित्र में चित्रकार ने भरा
प्यार से हर रंग का और तेज है उठा
गुड़सवार जब हवा की चाल को है यु छुआ
रूप प्यार का बना शुद्ध आनंद तो सदा
बसा हुआ है प्यार तो हर वक़्त के परछाई में
प्यार का एहसास बसा हर रिश्ते के महक में
ढूंढ नहीं प्यार को सिर्फ एक नाम और रूप से
फैला हुआ है प्यार तो ब्रह्माण्ड के हर कोन से
रो नहीं इंसान तू जग में नफरत देख के
खेल धूप छाओं का माया रहा जहान के
मुश्किलें तो बूँद है अनंत प्यार के सागर में
थाम ले इस बूँद को बदल उसे तू मोती में
मूर्ख ढूंढे प्यार को मेहबूब के इकरार में
प्यार तो बसा हुआ संसार के हर राह में
बूँद सी जिंदगी
बूँद सागर का है यह ज़िन्दगी
खुल के जी ले तू यह ज़िन्दगी
नफरते आग से जला न ज़िन्दगी
जी ले सब को जीने दे ज़िन्दगी
हर जन्म का मौत ही है अंत
ब्रह्माण्ड का भी होना है अंत
खेल है संसार का कहे हर संत
निभा पात्र को प्यार से तू अनंत
हार जीत न बना जीवन के अर्थ को
हवा में लकीर सिर्फ मान अपमान तो
गिनती न महत्व दे किसी भी दर्द को
कफ़न में ही सोया है हर महापुरुष तो
माँ-बाप के ख्वाबो में जनम हुआ है तू
पोतों की यादें तक ज़िंदा है तू
जूनून के संसार में रोया है क्यों
क्यों फंसा इस माया जाल में तू
न शिकायत हो न मोह जिंदगी से
सुबह सुनहरी या शाम अंधेरो से
ज़िन्दगी जी ले एक ख़याल से
संसार बुनी है बिन मतलब के माया से
बूँद सागर का है यह ज़िन्दगी
खुल के जी ले तू यह ज़िन्दगी
सूर्यनमस्कार
सूर्यनमस्कार से कोई हिन्दू नहीं बन जाता
सर झुके मस्जिद पर मुसलमान नहीं हो जाता
हर धर्म रहा एक ही मंज़िल का रास्ता
दो इसे राम, अल्लाह या येसु का वास्ता
बसा है ख़ुदा हर मंदिर के मूरत में
राम तो रहा मस्जिद की हर धूल में
जब भी झुका सर और जुड़े हाथ लगन से
रोशन बना दुनिया दिल के उस प्यार से
येसु की कहानी से आँखे नाम हुई
अजमेर दरगाह पर सर प्रेम से झुक गयी
गुरु ग्रन्थ पढ़ी तो सच की मूरत दिख गयी
बद्री विशाल में दिल मोम सा पिघल गयी
और राही की चाह में मंज़िल पास नहीं आती
चले हर इंसान मेरे ही धर्म पे बात नहीं भाती
हर राही रहा अपने ही राह का खंडपति
एक सागर से मिलने को कई नदियों है बहती
जन्नत की आशा में हर धर्म रहा सर्वोत्तम
मंज़िल की साधन में हर कोशिश है उत्तम
दूजे के औज़ार से सफर के अवरोध मिटे
सूर्य नमस्कार से तो सिर्फ जिस्म का मैल कटे
डरता है दूसरो से जो समझ सके ना खुद को
अपने जल से शांत करे न दिल की अगन को
नास्तिक न बन तू न तोड़ पडोसी के घर को
हर धर्म के संतो ने कही उत्तम सिर्फ प्यार को
सूर्यनमस्कार से कोई हिन्दू नहीं बन जाता
सर झुके मस्जिद पर मुसलमान नहीं हो जाता
पैसा और पहचान
पैसा और पहचान पहिये दो इस देश के
चोर खूनी घूमे समाज में इज़्ज़तदार बनके
क्या मतलब रहे इस क़ानून और नियमो के
तोड़ने वाला हर अमीर रहे, बाहर ही जेल के.
बना है कानून गरीब और लाचार के लिए
जिस सर पर हाथ नहीं नियम बना उसी के लिए
गला दबा कर नियम अमल हुए सोना चांदी के लिए
कठिन कायदे बने तोड़ने की कीमत बढ़ाने के लिए
बनते है कानून उन्नत देश की छबी देख कर
कभी अमल न होंगे सबको है यह खबर
हर नियम बना करोडो कमाने का आधार
कानून के रखवाले बने कानून के बेशर्म दलाल
मुश्किल हुआ है जीना इस देश में
नियम तोडना ही पड़ता है कुछ जीने के लिए
हर कायदा बना मज़ाक देश के पालन में
इज़्ज़त लुटी जब दफ्तर का चपरासी मालिक बन लिए
जेल में गरीब, बेबस और लाचार ही बसें
मुक्त हो जो पैसा और पहचान से
बढ़ रहा देश बर्बादी की और बडी तेज से
क्या रोक सकता है कोई इसको टूटने से
संभलने कह दो इस देश के वासी को
याद करे अपने सूरज से संस्कार को
सोचे महान संतो की बातों को
भरे देश प्रेम से खोखलेपन की राहो को
दुश्मन बहुत रहे इस देश को फोड़ने के लिए
नादानी से बल न दे उन हाथो के लिए
मुश्किल है क्या सपना देखने के लिए
कानूनो को बना इस देश को आगे बढ़ाने के लिए.
भूल जा और जी ले
भूल जा और जी ले तू
माफ़ कर और जी ले तू
प्यार से तू झूम ले
जी के सबके जीने दे
कोई यहाँ धर्म नहीं
कोई यहाँ कर्म नहीं
है नहीं मजहब कोई
बाहर तेरे खुदा नहीं
जी ले अपनी ज़िन्दगी को
प्यार से रंग हर चीज़ को.
भिन्नता को ले गले
अच्छा बुरा को मान ले
है नहीं कोई सही
कोई यहाँ गलत नहीं
सब को है जीने का हक़
प्यार पर सब का है हक़.
संगर्ष ना मान इस जग को तू
हंसी को ला दे चेहरे पे तू
कोई यहाँ अतीत नहीं
कोई यहाँ भविष्य नहीं
इस पल से ही रोशन है जग
इस पल से ही रोशन है तू
यह पल है सिर्फ प्यार का
यह जग रहा सिर्फ प्यार का
सिर्फ मैं हूँ , सिर्फ मैं हूँ
तू तो कभी तू न था
ना कभी भगवान था
है अगर सच की चाह
तो है यही जीने की राह
सफर का नशा
छोड़ देते है लोग पीछे ज़िन्दगी की राह में
तेज से आगे बड़े लोग मंज़िलों की चाह में
गम से तू बदल नहीं अपनी ही रफ़्तार को
सफर में जो नशा रहा कहाँ वो बात मंज़िल में
झरना तो चला पर्बतों से मस्त अपनी राहो में
सदा है खुश रहा अपनी हर एक मोड़ से
ना रहा परवाह उसे हर नदी के चाल से
सफर में जो नशा रहा कहाँ वो बात मंज़िल में
अपनी तेज़ के गति से उड़ा पंछी आकाश में
पवन से मिली ख़ुशी बिन किसी ख़याल से
मस्त सा वह झूम उठा फैला जब पर गगन विशाल में
सफर में जो नशा रहा कहाँ वो बात मंज़िल में
मंज़िलों की चाह में क्यों रहा बेचैन तू
उठता गिरता क्यों बढा इन अँधेरी राह में
मंज़िल तो फैला वही जिस जगह पे रुका तू
सफर में जो नशा रहा कहाँ वो बात मंज़िल में
हर वक़्त को तू थाम ले दिल को पूरा खोल के
राह और मंज़िल रहे बहुत संसार के खेल में
तेज़ से दौड़ा मगर तू, पहुंचा चक्र के आरम्भ में
सफर में जो नशा रहा कहाँ वो बात मंज़िल में
नये साल की शुभकामनाये
नये साल की शुभकामनाये मेरे हर दोस्त को
ख़ुशी हमेशा सजाये जीवन के हर मोड़ को
हर वक़्त तुम्हे मिले प्यार के अनगिनत फूल वो
महक उठे हर राह जो छूए तुम्हारे कदम को.
मांगू दुआ भगवन से मैं दुःख तुझे कभी न मिले
सिर्फ ख़ुशी के नीर हो जो कभी आँख से गिरे
उस हिम्मत की मैं तुझमे आशा करू
जो हर चट्टानें मुश्किल का विस्फोट करे
कोई दुश्मन न गिरे तेरे मंज़िल की राह पे
कोई बद दुआ न फसे तेरे बढ़ते कदमो तले
हर मंज़िल गले लगे इस नए साल में
साल के हर मोड़ पर सिर्फ जीत ही अपना नाम दे.
हो हमेशा दिल के पास सफर में जुड़ा हर दोस्त वो
शिकवा कभी न करे तेरे हर एक रंग से जो
मोती भी धूल है गर प्यारे दोस्त का साथ हो
जात धर्म की बात से रिश्ता कभी नापाक न हो.
कुछ घडी का सफर रहा ज़िदगी का यह खेल
हर तरह के तीर का हो तेरे कमान में मेल
बूँद बूँद से बना है सागर यहाँ गहरा विशाल
नया साल बने तेरी ज़िन्दगी का ek बूँद अनमोल.
हर वक़्त, हर दिन, हर महीना और हर साल
चूम ले ज़िन्दगी तेरी हर तरक्क़ी का मशाल
और कभी दुःख तुझे खींच ले उदासी के तूफ़ान में
एक दोस्त है हमेशा खड़ा कुर्बान हर ख़ुशी तेरे राह में.
दोस्त
दोस्तों की दुआओं से दिल भर गया
दिल की परेशानी हर, खामोश हो गया
सूरज चाँद से दुनिया चले न चले
ज़िन्दगी तो सिर्फ दोस्त के प्यार से चला
मिले हर मोड़ पर गढ्ढे हज़ार अंधेर के
दोस्ती की रोशन से हुआ पार बिन कश्मकश के
रुका तो नहीं ज़ख्म दुनिया के पथ्थरों से
मलहम जरूर लगा एक दोस्त की आवाज़ से
मंज़िलें पायी है कई, दोस्त अपनी राह में
कोई चूमे बादलों को, तोड़े कोई ज़मीन को,
रिश्तों में क्या फरक पड़ा, फासले प्यार का वही रहा
प्यार तो महका सदा, दोस्त के बागबान में.
कहते है की जाम तो निखरता है वक़्त की पुकार से,
नहीं तुलना इस नशा का, पुराने दोस्त के प्यार से
दोस्त की दोस्ती से दुनिया का है दिल इतना भरा
हर पल और राह बना, सावन का झूमा, पत्ता हरा.
मांग लू भगवन से मैं दुआ सिर्फ एक वो
खुश रहे दोस्त अपनी ज़िन्दगी की राह पे
जब कभी भी मांग लू मैं खुदा से हाथ को
भेज दे एक यार को ,हो उसका एक रूप जो.
जीने की राह
ज्यादा की आशा नहीं
कम की चिंता नहीं
कल के यादें नहीं
कल के ख्वाब नहीं
किसी से भी बैर नहीं
कोई हमसे गैर नहीं
किसी प्यार में कमी नहीं
किसी रिश्ता से शिकवा नहीं
कोई हालत से डर नहीं
हर तक़दीर अपना सही
किसी सुबह की चाह नहीं
किसी शाम का ग़म नहीं
कोई दुःख के आंसू नहीं
कोई सुख की आस नहीं
कोई दोस्त से शिकवा नहीं
कोई दुश्मन से गिला नहीं
ज़िन्दगी का दस्तूर यही
जी ले अभी और यही.
ज़िन्दगी का हेतु
ज़िन्दगी का एक हेतु, पा ले तू उस प्यार को,
दिल के राहो में बसा,अनंत आनंद का रूप जो,
दिए नाम कई इसको, देश के संतो ने जो,
जीत है सबसे बड़ी, पाये जो इस ज्ञान को.
चार क्षण का जीना यहाँ, ज़िन्दगी की राह में,
व्यर्थ करके रख दिया,बेजान रंग के खेल में,
छू ले तू उस देव को, जो बसा दिल में तेरे,
पा ले तू उस मोक्ष को, निर्वाण कहे सब संत जो.
मूर्ख है इंसान बड़ा, आसान समझा इस राह को,
कुचले गरीब को पाँव से ,झुके मंदिर के चरण को,
पैसा डाल हुंडी में, मांगे झट-पट मोक्ष को,
पेट भर के पंडित का, धोये अपने पाप को.
गीत सुनाने दुनिया को,बरसो लगे मेहनत को,
अनंत सुख की चाह में, क्यों ढूंढे सरल राह को,
गुण-लक्षण कई है पाना, यह हसीन आस को,
भाग्य है इस देश का, संत दिखाए राह को.
है वही इंसान सच्चा, जो डरे न दुनिया से,
है और भी सच्चा बना,न दुनिया भी जिससे डरे,
झूम कर उस प्यार में, गले लगाया हर जीव को,
किया कर्म दिल तोड़ कर, त्याग कर हर इच्छा को.
तख़्त, पैसा, और खिलोने, सब नचाये दिमाग को,
हर हवा के फूंक से, हिले जूनून भरा दिमाग वो,
मन झकड कर, चट्टान सा तोड़ दे तूफ़ान को,
धूप छाँव के खेल में, हंसी एक तेरा शस्त्र हो .
भस्म कर तू राख में, काम, क्रोध और लोभ को,
प्यार के शीत जल से, तू भुझा अहंकार को,
एहसास कर दिल में तू, सूरज हज़ार रोशन को,
हो अतीत जन्म-मरण से, बन अनंत सुख का रूप तू.
वक़्त और भगवान
जूनून है दिमाग का, वक़्त की अवधारणा,
सोच है मन का तेरा, जकड यह वक़्त का,
अतीत और कल रहे, रूप अभी के नाम का,
नाश जब मन हुआ ,नाम नहीं ब्रह्माण्ड का.
ज़ोर जितना दौड़ हुआ, गति कम हुआ यह वक़्त का,
रौशनी की तेज से, वक़्त तो पूरा ही थम गया.
जब रोशिनी ही बन गया, नाम नहीं वक़्त का
ज्योत के चिराग में, नाम नहीं जहान का.
है नहीं दिशा, मन के इस उड़ान का,
दूर दूर है चला, आस लिए प्यार का,
मन के आँगन में बसा, मोतियाँ ये प्यार का,
दिल में है सदा जला, रौशनी ये प्यार का.
पा ले मोतियों को तू लेके मन्त्र विचार का,
तोड़ दे तू सोच से, दिमाग ये जूनून का,
धूल में तू झोंक दे, शरीर यह मलीन सा,
पा ले स्वर्ग को यहाँ, न वक़्त न शोर ज़मीन का.
झूट की बुनियाद पे, स्वप्न-महल है जहॉ,
उठा तू जब नींद से, रूप है भगवान का,
ना जात हो ना धर्म हो, ना नाम हो कोई लिंग का
अतीत सब से तू बना,अनंत रूप प्यार का.
ना ही तेरा जन्म है, ना है साया मौत का,
डर का कोई कण नहीं, समुद्र विशाल तू प्यार का.
आदमी का विकास
गुजरे दिन जैसे दुनिया में , लड़ा इंसान और नफरत से
आज लड़ा है भैया से, कल झगडे पड़ोसन से .
अपनी बात ही सच्चा माने, लड़े धर्म यहाँ सदियों से,
धर्म सभी है बाग़ के फूल, क्यों नहीं समझा बात यह दिल से.
एक धर्म के लोगो को, तोडा जात पात के झगड़ो ने
भाषा मूल बनी नफरत की, प्यासे रिश्ते लायी नदियों ने,
खून बहाया है नदियों में , प्रांतो के इस झगड़ो ने
युद्ध कराये देश को यहाँ, जुनूने-ज़मीन की चाह ने.
सोच लगा के थोड़ा देख, सदा लड़ा है इंसान यहाँ
दबा सदा अंगार नफरत की, मजबूर रहा दुनिया यहाँ
जुड़ा इंसान बड़ी मुश्किल से, अर्थव्यवस्था की गोंद से
तंत्रज्ञान लाया है पास, कुछ लोग की बेचैनी से .
बंटा बेहद इंसान यहाँ, बंधा एक कच्ची डोर से
भँवर मंडराया है सर पे, युद्ध और आतंक सदा जग पे
बड़े अहम से विज्ञान खुश,आदमी के इस विकास से
भ्रम बड़ा है इंसान को, की सबसे विकसित जानवर वो
दूजे जानवर मारे जानवर को, सिर्फ निभाये पेट धर्म को ,
कल्पित प्रगति के नाम पर, नहीं तोड़े सुन्दर जग को
क्या नाम रहा की जो दे दू , आदमी की इस विकास को
क्या गुण और मात्रा दू, इस परम जग के विस्फोट को
कीटाणु से शुरू हुआ, इंसानो का यह अजब विकास,
विकास के पेड़ पे कहे, आदमी का है उच्च निवास
गलत रही है बात यह बेशक, रहा मेरा गहरा विश्वास
अजीब सा पत्ता है इंसान, एक बाहरी डाल पर है निवास.
उठना हमें बहुत ऊंचा है, नफरत छूटे दिल से जब
रास्ता लम्बा ही सही, शांति को पाये वो जब
पक्की डोर से बंधे है सब, यही बात समझे जीवी जब
कठिन विकास में इंसान की, तरक्की का सच्चा नाम रहेगा.
हर जीवी है भगवन का रूप, बात समझ ले संतो से
कुछ हद तक है बड़ा इंसान , अपनी दिल और दिमाग से
फासले बहुत पार होने है, सच्चाई की राहो पर
मिला नहीं भगवान से जब तक, छोड़ नहीं यह मुश्किल डगर .
फूलो का गुलिस्तां है यह देश
फूलो का गुलदस्ता है यह देश मेरा
हर रंग के फूल का है यहाँ बसेरा
कई भाषाओं के तेज़ से निखरा है देश का चेहरा
हर भाषा के साहित्य में मिला मोतियों का ढेरा.
मोक्ष ही मंज़िल बनी ज़िन्दगी की राह पर
हर धर्म बना योग्य इस हसीन छाह पर
हर जगह जब धर्म फंसा संकटो की जाल से
सिर्फ मेरा देश था जो शरण दिया प्यार से.
हर धर्म का चेहरा बसा इस देश के भूगोल में
अपनी लक्ष्य की खोज में डर नहीं किसी और से
है समुन्दर की बड़प्पन देश के विचार में
रूप भगवन का दिया नास्तिको को प्यार से
वाद विवाद जनतंत्र तो बसा हज़ारों साल से
शांती था देश का धर्म अशोक के भी पूर्व से
हैरत देख देश का दिल दुनिया दौड़ी लालच से
निर्बल माना टूटी सेना हम पर बड़े ही द्वेष से
भारत ही एक देश रहा पड़ोस पे कभी न वार किया
कभी न चाहा कब्ज़ा पाना निहत्थों के आँगन का
चला बुद्ध के शिष्य यहाँ से, दुनिया को सिर्फ प्यार दिया
चला सिपाही ज्ञान को लेकर, शून्य और विज्ञान दिया.
सबसे प्राचीन जग की गाथा, वेदांत रहा अनमोल सितारा
जीवन के सिद्धांत से झूझा आज भी मन बिना सहारा
खोला राज़ सदियों पहले यही सिद्धांत सूक्ष्म से
निकल रहा था जग का वासी काली गुफा के अंधेर से
शिकरो पर संगीत हमारा, दुनिया जब बोली न सीखी
जादू टोना चला था जग में, अयुर्वेद की जडे थी मोटी
भगवन बसा है हर दिल में, यही बात थो हमने सीखी
योद्धा अँगरेज़ आया उठाने , उनसे ही तो किस्मत फूटी
जाती वर्ण का निर्माण हुआ, देख गुण और कर्मो को
ग्रन्थ दोहराई है यह बात, सदा देश के लोगो को
कभी न बात कही संतो ने, जाती बंधा जनम से
मोक्ष ही है सुन्दर लक्ष्य, कुछ रिश्ता नहीं जाती से.
बात बिगड़ी आदमी से, जन्म बना जात का मूल
क्रूर बना धर्म इसका और झगडे बाग़ के फूल
दुश्मनो ने देश तोडा, छेदा इस शस्त्र से कवच को
अफ़सोस आज भी की, राजनीती करे उसी काम को.
दर्द से चिल्ला के कह दू देश के हर फूल को
भूल जा तू प्रांत, भाषा, रंग , जात ,और धर्म को
रंग जा सिर्फ एक रंग से नाम जिसका देश हो
जोड़ ताकत बन के एक और राह दिखा प्रपंच को.
जनतंत्र
चोरों का राज चला है इस देश में
गणतंत्र तो फूट चुका मेरे देश में
मतों की ताक़त से बना सरकार यहाँ
मत पाने का हर रास्ता हुआ भ्रष्ट यहाँ.
मत बटोरना काबिलियत का तो कोई समकक्ष नहीं
बातो से जन को हिलाना ईमानदारी का चिन्ह नहीं
आदमी को तोड़ने में कसर कुछ बाकी नहीं
पैसा, मदिरा, और चावल से ख़रीदा नादान को सही
देश का वासी तो टूटा है कक्षों में
जाती धर्म से बंटा है हज़ारों में
खोया है देश प्रेम जात पात के झगड़ों में
राजनीती ने तोडा इस देश को करोडो में.
चपरासी की नौकरी को भी शिक्षा पूँछ लिया
काम करने वाले को उम्र आने पर भगाया
लेकिन अनपढ़ कब्र में पाँव रखकर देश को चलाया
जेल में बैठकर हक़ मंत्री बनने का कानून बनाया.
आम आदमी तो पल रहा है भूख के अंधेर में
रिश्तो का तो चमका तारा ठेकाओ के धूप में
बंध दरवाज़े विदेश के जो गया है जेल में
पर बिछा लाल कालीन अपराधी बदला जब मंत्री में.
कानून से सब है एक कहे जनतंत्र के धर्म को
देश के पालन में सभी योग्य क्यों माना इस अधर्म को
वैद्य को और मोची को चुना देख उसके दक्षता को
देश का चाबी दे दिया देख चेहरा,धर्म और जात को
करोडो का ऋण माफ़ी किया मत पाने की धुन में
डूबा लालच में मतदाता लाखो की भैंठ में
जमा पैसा चुनाव के बाद विदेशी कक्षों में
किसका पैसा है सब, रहा सवाल इस जनतंत्र में.
घुस जाते घरों में झुके सर और जोड़े हाथ लिए
चावल का दाना हमारे थाली से उठा लिए
मंत्री बनने पर अफ़सोस यह बात बने
हज़ारो बन्दूक हमें रोके, तनिक आँख भी मिलाने के लिए
हज़ारो गड्ढ़ो से सजे देश का हर रास्ता यहाँ
चाँद पे पहुँचा विज्ञान पर सरकार इन्हे भर न सका
चांदी की तरह चमके यह रोड, जब मंत्री इस शहर से गुजरा
कांच ही की तरह फूटा जब उनका जुलूस शहर का सीमा पार हुआ
ऋतुओ की तरह बदले कई सरकार यहाँ
खोज में सावन की सदा भटके आदमी यहाँ
रोटी, कपडे और मकान की आस में तड़पा यहाँ
मौत पाने का औज़ार तो बदले हरदम यहाँ
क्रांति तो होनी है लेकिन अफ़सोस हर राज में कमी रहा
अच्छे शासक की आस में देश तो भूखा ही रहा.
एक ही डोर
है गुलदस्तां फूलों का, दुनिया के इंसान यहाँ
जनम पर ख़ुशी छायी, मौत हर आँख पर आंसू लायी
प्रीत की हंसी हर दिल में तूफ़ान जगाई
सावन की घटा हर किसान को हिम्मत दिलाई.
हर रंग का इंसान निकला घर से रोज
प्यार और ख़ुशी का लिए दिल में खोज
ढूंढा प्यार को, आदमी और चीज़ो में हर रोज
जोड़े धागे सा हर इंसान का यह खोज.
फिर क्यों काट रहा है गला इंसानो का
क्यों बहा रहा है नदियां खून का
झूमा जूनून से पाने हुकूमत और ज़मीन को
छोड़ा सब कुछ यहाँ जब मिला इस धरती को.
किया हर काम तूने रखे दिल मैं कुछ आस को
बना व्यापारी तू बेचे अपने किस्मत को
है वही सच्चा जो बांटे सिर्फ प्यार को
मेहनत से पाया दिल के असीम प्यार को
जन्नत बनाया दुनिया की हर राह को
सदा ख़ुशी में झूम लेगा मिलकर हर इंसान को.
कहा गया वह प्यार
पले नौ महीने तेरी ही खोख में
बेसहारा गिरा जब दुनिया की अंधेरो में
जिस्म के कण- कण को दिया सहारा तूने
हर बेचैन मुश्किल में राह दिखाई सिर्फ तूने.
पहले अक्षर का निर्माण अर्पित है तुझे
आज खाती है खांसी तो लगे बुरा मुझे
दोस्तों के सामने आई तो चिड़ हुआ मुझे
कहा गया वह प्यार, कहा गया वह प्यार.
ऊँगली पकडे पिता के उठा कदम पहला मेरा
हर खिलोने की चाह तुझ से हुआ पूरा
डर की हर तूफ़ान का तू बना किनारा
दुनिया जीतने का एहसास हुआ बातों से तेरा.
आज झगड़ा तेरी हर बात से
सहन होता नहीं छोटी सी मश्वरा से
बड़ा इतना हुआ ,माफ़ भी कर दिया तुझे कभी कभी
कहा गया वह प्यार, कहा गया वह प्यार.
साथ खेले दोस्तों के संग हम तुम
झरनो में चलायी कागज़ के नाव हम तुम
हर निराशी का कन्धा बने थे तुम
हर राज़ का राज़दार बने थे तुम.
कपडे पहने तेरे हुए जब तुझको छोटे
लूटा पड़ोसन के आँगन से अमरुद मोटे
तेरी गलती की मार मुझ पर उठी
लेकिन कसम से मुँह से कभी उफ़ ना उठी.
बहुत सताया तुझे खींच कर तेरी चोटी
खूब हँसा जब तू मेरे बातों पे रोई
लेकिन झगड़ा दुनिया से जब किसी से तुझे ठेस हुई
और राखी के दिन प्यार से सब कुछ माफ़ हुई.
भैया और बहन मिले आज न्याय के घरो में
घर-ज़मीन के कागज़ लेकर पैसे लुटाया वकीलों पे
घर पाने की बेचैनी में देखा नहीं तेरे मुश्किलों को
पैसे पाने की जूनून में खोया तुम्हारे प्यार को
कहा गया वह प्यार, कहा गया वह प्यार.
आँखों में तेरी सागर सी गहराई थी
बगीचे शर्माये वह होंटो पे लाली थी
वह मुस्कान पर जान तक लुटाई थी
जब मुलाकात तुमसे पहली बार हुई थी .
बातो से तेरी कतराया आज मैं
मुस्कान को अट्टहास समझता हूँ मैं
देखने श्रृंगार को आँख तक उठाया न मैं
कहा गया वह प्यार, कहा गया वह प्यार.
नाम रूप जब दिया प्यार को मैंने
क्यों हो रहा है जो देखा है मैंने
टूटा यह प्यार, जब वक़्त की नदियां बही
प्यार का तड़प तो सदा दिल में ही रही.
संतो का रहा जवाब इस नादान से
प्यार का तू बुत रहा है जनम से
असीम रंग प्यार का, छिपा है तेरी ज्ञान से
रंग दे हर नाम को, इस प्यार के तू रंग से.’
जब चित्र बना संसार का, तेरे ही इस प्यार से
वह ख़ुशी में झूम लेगा,हर आदमी के प्यार से
उठेगी बात न फिर कभी तेरे दिल से
कहा गया वह प्यार, कहा गया वह प्यार.
दीवार
दीवार एक मजबूत बना, मैं खड़ा उसके बाहर,
अन्दर है प्यार के मोती, बाहर दिखा दुनिया का सफर.
पत्थरों से है बनी यह दीवार अज्ञान की,
है कठोर यह बना, धुन में जिस्म और मस्तिष्क की,
जुड़ रहा है एक पत्थर हर जनम की चाह से,
बढ़ रहा है यह दीवार अपनी ही नादानी से.
बाहरी रस्ते दिखे बहुत ही आसान से,
ढूंढने तक़दीर को, चल पड़ा हूँ शान से,
कामयाबी को खुदा जानकार, देखू मैं कई लोग को,
कोई पकडे गीत को, और कोई विज्ञान को.
चमका तारा कोई, खेल के रंग में,
आग की तरह जला, कोई अपने लेख से,
कोई चित्रकार डूबा, रंग की आहोश में,
दूर-दूर राही चला, कितनी ही बेहोशी से.
नाम, शोहरत और हुकूमत की चाह में,
समझा नहीं की सफर तो अनंत चला इस दौड़ में,
खुशियों के छोटे फूल बिछे है राह में,
खुशबू उठी और मिटी कुछ पल का साथ दिए.
मुढ़ के थोड़ा देख तू ,अज्ञान की दीवार को,
ज्ञान के विस्फोट से, तोड़ इस दिवार को
कुछ जन्म का ही फासला हो चाहे इस राह पर
होनी तेरी जीत बेशक इस हसीन चाह पर.
चंद लम्हों का सफर तेरा यहाँ,
तेरी कोशिश ही है मंत्र मोक्ष का,
दिल का भगवन राह दिखाया है सदा,
तू तो है मूरत अनंत प्यार का.
मोतियों का ढेर है इतना बसा,
तुझे मिला अनंत प्यार का फ़िज़ा,
नाज़ुक नहीं है कांच सा जो सुख मिला,
झूम के पाले ज़रा मोतियाँ ये प्यार का
है यही मक़सद तेरे अनगिनत जन्म का.
CRY OF THE FOETUS
The days are not so good for me,
The future not too bright for me,
Bad world indeed it is, for people to live,
But, even to take birth, is worse for me.
Science is progressing they say,
Many an invention has come to stay.
The sonogram is a boon to many,
But a curse to me, in great irony.
Many a birth does a man take,
To achieve a state of salvation,
Condemned I am to begin with,
The smallest developmental error leading to termination.
Doctors snuff me out quickly,
If my looks tell a different tale;
Society kills me readily too,
When I promise to come out as a female.
Give me a chance, I say to you;
Let me come out and pray to you,
This life has come after many a birth,
Accept me for whatever is due.
I may be your loving child,
Giving a reason for you to live;
I may be a great achiever,
Pride to the society I may give.
You do not kill a person for his disease,
Then why remove me for the slightest issue?
Treat me if you can after diagnosing my problem,
Or, can you prepare the society to receive me, however be my tissue?
My hope is the foetal medicine specialists,
And the Paediatric Surgeons too;
Spend your efforts to save me if you can,
It is a great thing to be born in this holy land,
But allow me to come out as best as I can.
A warning to all my friends out there,
The Paediatric surgeons out there too;
Technology is removing the ‘abnormal’ foetuses fast,
With lack of work, faster will be your elimination too.
मतलब
क्या मतलब लू इस दुनिया का,
सोचु मैं बहुत दिनों से,
मिलता क्यों नहीं वह सुख,
जो सदा रहे साथ मेरे.
नौ महीने बीते, अपनी माँ के खोख में ,
आया दुनिया में रोते हुए , खुशियों के उठे लहरे ,
बीता वह पांच साल अज्ञान की अंधेरों में ,
बहुत साल बाद जब ज्ञान से देखा , वही लगे सबसे प्यारे.
उठे कदम बड़े मुश्किल से , ऊँगली पकडे बापू के ,
फिर खूब बितायी कमरों में , बीस साल अपने पल के ,
रहा मगन किताबो में , हसीं बनाने राहो को,
नौकरी और फिर शादी आई , और गिरा मैं चुंगलो में .
बीत गया हर इक पल अपना ,
घर के अनगिनत जुनूनो में ,
ख्वाइश कभी ना कम हुआ ,
सब कुछ पाने की धुन में .
बच्चो की ममताओं पर, कटी ज़िन्दगी के कुछ साल ,
उनकी हार – जीत से लिपटा हुआ , जीवन का हर एक ख़याल ,
चाहत में पैसो की ,भूला हर मैं ईमान को ,
त्यागा परिवार की आशाओं पर , धर्म की हर एक राहो को .
निकले घर से जब वह एक दिन , अपनी राह बनाने को ,
बेचैन आशा लेकर बैठा , की खब खेलु मैं पोतो से
कहा तक यह सफर चलेगा , कब रुकेगा दौड़ यहाँ ,
मतलब क्या इस जीवन का , कहानी जब वही रहा .
रुख कर देख जरा आगे , नहीं मतलब इस दुनिया का ,
जीवन तो एक मौका है , पाने असली मंज़िल का .
दिल का भगवन पाने , यही मतलब है जनमो का,
आसमान के शिकरो पर , मोती ढूंढा पागल सा.
संत की एक बात तू सुन ले ज़रा ध्यान से ,
है बसा जन्नत तो दिल में कितने ही सदियों से ,
ढख लिया है तूने इसको दुनिया की जूनून से ,
रौशनी को जगा ज्ञान के अंगार से,
और मुक्त हो जा तू , जन्म -मरण के ज़ंजीर से .
क्या मतलब लू इस दुनिया का
सोचु मैं बहुत दिनों से ,
मिलता क्यों नहीं वह सुख ,
जो सदा रहे साथ मेरे .
शहर का गड्ढा
चार फ़ीट का गड्ढा बना ,
शहर के महत्वपूर्ण मोड़ पे ,
हुआ बिछाये रास्ता को ,
चार दिन भी न गुज़रा था .
रस्ता बना बड़े मुश्किलों से ,
बहुत मिन्नतों के बंदिशों से ,
वोट की दबाव से , नोट की आशा से ,
रस्ता आखिर बिछा मंत्रीजी की आदेशो से .
बरसा वह पहला हल्का सा बारिश ,
उठा खुशबू वो सोंधी सा ,
चार फ़ीट उठा , रस्ते के चेहरे पे ,
उठा पर्दा देश की भ्रष्टता पे .
चल रहा हर वासी उस पर ,
गाड़ियों में घूमा अफसर उस पर ,
कलेक्टर , कमिश्नर और कॉर्पोरेटर ,कोई रुख नहीं उस पर ,
मंत्री का जलूस भी निकले उसी रस्ते के मोड़ पर .
इतनी सी बात लेकिन है यहाँ पर ,
गति कुछ कम हुई , पहुंचा जब उस मोड़ पर ,
पार हुआ , गाडी को लगे पर हज़ार ,
धूल झोंक कर आँख में , दौड़ा यहाँ का हर अफसर .
ढका झटपट यह गड्ढा जब कोई मौत आई ,
या कभी शहर ने बड़े आदमी की तशरीफ़ पायी ,
नकाब फिर उठा , अगला बारिश जब छायी
फिर चुनाव के वक़्त , वही कहानी दोहराई .
पत्रकारों की भी अजब दास्तान हो गयी ,
खूब मचता है शोर जब किसी की मौत हो गयी .
या दुर्घटना में गाडी बरबाद हो गयी ,
गड्ढा ढकने की बात लेकिन किसी ने न कही .
विज्ञान बहुत बड़ा इस देश में ,
आदमी को बिठाया चाँद की गोद में ,
लेकिन अजीब सा हाल है इस देश में ,
नहीं बन सका एक ढंग का रोड इस देश में .
हर व्यवस्था अपनी जगह है यहाँ ,
भ्रष्टाचार का प्रतीक बने है रस्ते यहाँ
नपुंसक बना देश का हर वासी यहाँ ,
जो खामोश इन रास्तो पर चला यहाँ .
चार फ़ीट का गड्ढा बना ,
शहर के महत्वपूर्ण मोड़ पे ,
हुआ बिछाये रास्ता को ,
चार दिन भी न गुज़रा था .
कवी हूँ मैं, कहता हूँ दिल की बात को
कवी हूँ मैं, कहता हूँ दिल की बात को
ढूंढता हूँ लोग को , सुने जो मेरी बात को .
मुश्किल बड़ी है दुनिया यहाँ ,
मजबूर बड़े है लोग यहाँ ,
प्यार नहीं कही पास यहाँ
चाह नहीं किसी और यहाँ.
समझा मैं दुनिया की रसूलो को
कहना है सबको, सुनना नहीं पर किसी को
वक़्त नहीं है कान बढ़ाने को
वक़्त नहीं है गले लगाने को
बाते बहुत कहा, काम किसी के आ सके
सुनाते सब है बाते, काम मुझे जो आ सके
‘पहले आप’ तो जग से सारा ही उठ चुका
पहले मैं का रिवाज़ ही सिर्फ दुनिया मैं छा चुका.
मैं यह सोचूँ कब जहाँ में यह हुआ
कवी की बातो का कब यहाँ पहचान हुआ
जहाँ न बदली किसी की बात से यहाँ
आस लेके क्यों मैं बैठा कहने अपनी बात को .
कुछ फरक पड़ता नहीं , तेरी चीख और आवाज़ से
कह ले अपनी बात को , अपने दिल की शौख से
कुछ तो सुनते जाएंगे हमदर्द के रंग से
सर हिलाते जाएंगे , झूटी तारीफ़ होंट से
तनिक भी न छूएगी दिल के बाहरी द्वार से .
अपनी बाते कहते जा अपनी ही आराम को
कोई बैठा है नहीं सुनने तेरी बात को
प्यार से तू गीत गा ले, श्रोत की चिंता न कर
है राह के अंत तक , अकेला रहा यह सफर .
दुनिया
जहां बदलने की चाह , दिल में तू ना रख,
वो तो चलती जायेगी राह के अंत तक.
संत कई आ चुके , कई महात्मा जी चुके,
कई बाते कह चुके , कई कर्म कर चुके,
गुम कभी न दर्द हुआ ,
कभी न दुःख कम हुआ.
नासमझ इंसान यहाँ , चली है प्यास सदियों से ,
भुझी नहीं किसी भी जल से
राहें भरी है नफरत से ,
बदली ना यह किसी के दम से .
आस-निराश के पहियों पर,
सुख -दुःख के कंधो पर ,
चला दुनिया का हर एक घर ,
चला इंसान का हर एक सफर .
नादान वो चला बदलने दुनिया को ,
संतो का बात एक ना समझा जो,
निकाल सकता नहीं दुनिया के हर एक कांटे को ,
पर ढख सदा ले , राह चले पाँव को .
आग का जलना तो , नाम है उसका मगर,
पास या दूर जाना है तेरी चाह मगर.
नफरत हटा दिल से अगर,
भरा प्यार से गर, ज़िन्दगी का हर डगर,
दिल बना जब प्यार का मंदिर अगर,
स्वर्ग है दुनिया का हर एक सफर .
जहां बदलने की चाह दिल में तू ना रख ,
वो तो चलती जायेगी राह के अंत तक.
बसा हर दिल में है भगवान्
बसा हर दिल में है भगवान्,
फिर क्यों तड़प रहा इंसान.
ढूंढ नहीं कीमत पे ख़ुशी को,
राह बिछा तू फूलों का,
उगता सूरज, चाँद के चेहरे,
ख़ुशी तू लेले इनसे दिल का.
बच्चे की हंसी,और माँ की दुआ,
कुछ और नहीं अनमोल यहाँ,
थका हुआ जब घर को आये , नन्ही परी जब गले लगाये,
और नहीं चाहत पैसो की.
वही धूल से हम तुम बने,
वही सांस का बसेरा है,
प्यास वही है जल की सब में,
आग वही है सब दिल की.
शुरू हुआ है हर एक जीवी,
प्यार के उन्ही बाहों से,
चल रहा है वही पथ,
जिसमे सबका एक है व्रत.
बना इंसान सबसे अलग,
बाँट दिया है जीवों को,
कोई अपना प्रीत हुआ,
किसी का मरना जीत हुआ.
टुकड़े टुकड़े कर दिया,
जात पात के बंदिश से,
हर एक छोटी कारण से,
बना दिया दीवारों को.
आशा में सुख की वो चला,
छाया एक अजब नशा में,
इंसानो का गला काट के,
भूला वो इंसानियत को.
मंदिर में तो एक ही है दिल,
विज्ञानो में ना है अलग,
जैसे निकले द्धार से उनके,
क्यों हुआ वोह यु अलग अलग .
थका है तू इन दुश्मनियों से,
बहुत लड़े है युद्ध यहाँ पर,
बहुत चीखा इंसानो पे.
चल हाथ पकड़ हर इंसान का,
लिए प्यार अपने दिल में,
अब बीत ज़िन्दगी के थोड़े पल,
इंसानो के बाहों में.
बसा हर दिल में है भगवान् ,
फिर क्यों तड़प रहा इंसान.
देख नहीं राही
देख नहीं राही दूसरों की मज़िलों को,
चलना है राहों पर अपने ही तुझको.
हर रस्ते की एक शान है,
हर मंज़िल की एक आन है.
अपनी अपनी जगह खड़ा है हर इंसान,
तुझे पता नहीं तू कितनो का है अभिमान.
दुसरे की राह के फूलो से मत बिगड़,
है तेरे भी रस्ते पर गुलदस्ता कई फूल के.
कांटे तो होते है हर एक की ज़िन्दगी में,
दीखते दिखाते नहीं दुनियादारी की आहोशी में.
प्यार करना सीख ले अपनी ज़िन्दगी की राहों से,
मंज़िल तो आखिर सबकी एक है भगवान् की बाहों में.
कोई समझ सखा है इसको, कोई नहीं,
फिकर न कर तू इन बातों का.
देख नहीं राही दूसरो की मंज़िलों को,
चलना है राहों पर अपने ही तुझको.
खोया हुआ इंसान
खोया है इंसान दुनिया की गलियों में,
ढूंढ़ता है खुशियों को, खिलोने और तख्तो में.
दम भरने को वक़्त नहीं, दौड़ रहा है बगैर रुके,
कोख से कब्र तक, यही सफ़र सब काट चुके.
तड़प रहा है ख्वाबों की अनगिनत आहोशी में,
कुछ पल के खुश्बू को, हमेशा का साथी समझे.
कुछ दिन की हंसी जवानी पर, कुछ पल के हुकूमत पर,
बेशर्म त्याग दिया है, जीवन की हर एक साँसों को.
छोटी सी ज़िन्दगी, बसा है मंज़िल दिल में,
दूर गया है चलते-चलते, झूटी बड़ी दीवानगी में.
काट रहा है अँधेरे में, जन्मो से तू यह सफ़र,
रुक कर मुड़ कर पीछे चल, खूब थका इन रस्तों पर.
मंज़िल तो पायेगा रस्ते वापसी से,
आखिर शुरू हुआ है तू, मंज़िल की बाहों से.
मेरा देश महान.
मेरा देश है महान, गर्व मुझको है इसपर,
झुका हुआ है पर यह शीश, इस के फिसले राहो पर.
बहुत मंदिरों का निर्माण हुआ,
हर कदम पे भगवान् मिला,
पर भ्रष्ट हुआ इंसान,
जो भागीदार भगवन को समझा.
चढ़ा रहा सोना मंदिर में,
और लूट रहा इंसानो को.
बोटी बोटी चूस रहा है,
समाज कि हर एक जीवी को.
देवी माँ कि पूजा करता, खूब चाहत की आस लिए,
माँ- बेटी को दूर किये, औरत का यूं दहन किये.
औरत को भगवान् मानकर,
मारे खोख के नादान कलियाँ.
मेरा देश है महान, गर्व मुझको है इसपर,
झुका हुआ है पर यह शीश, इस के फिसले राहो पर.
बहुत गर्व है प्राचीन विध्या पर, हर विध्या की पूर्ण समझ,
जब दुनिआ थी अँधेरे में.
थे विज्ञान में हम तुम कुशल,
दुनिया में जब न थी गिनती.
हर राह बसा अब विद्यामंदिर,
विद्या छोड़ सभी कुछ अंदर.
गुरु रहा न शिष्य यहाँ पर,
पैसे की बोली हर पल.
बुलुंद हुए कई लोग यहाँ पर
छूआ आसमान कई लोग यहाँ पर,
जितना देश से दूर हुआ, उतना उसका रंग बड़ा.
फ़ायदा क्या इस विध्या का, जब आधा देश सोता है
थोड़े कि तरक्की जब, अरबो कि अविध्या पर जीता है.
विध्या तो बदनाम हुई, हर विद्यार्थी अब झूठा है,
पैसे की लालच में अब हर गुरु भी एक धोखा है.
मेरा देश है महान, गर्व मुझको है इसपर,
झुका हुआ है पर यह शीश, इस के फिसले राहो पर.
हालत देश कि यह, हर इलाज़ यहाँ होता है,
शहरो कि महलों में अब, हर बीमार घर जाता है.
बड़े इलाजों का यहाँ विदेशो से बे न्योता है.
पर मजबूर बड़ा हर गरीब यहाँ,
जो छोटे बुखार से मरता है.
बड़े हकीम है, बड़े शहरों में,
और माँ-बच्चा अंदर मरे अकेले में.
मेरा देश है महान, गर्व मुझको है इसपर,
झुका हुआ है पर यह शीश, इस के फिसले राहो पर.
काले लिबास के अंधेरें में, न्याय बड़ा अन्याय हुआ
तुला जब सोने में न्याय का वादी, इन्साफ और कुचल गया
अजीब हाल है वासी का आज,चोर से ज्यादा पुलिस का डर है
कानूनो के रक्षक से, धैर्य नहीं पर खौफ बड़ा है.
नहीं देखना कुछ सितारों को,
नहीं सुनना खिलाडी को,
हमे देखना है कमलों को, आँख छुपा के दल दल से,
देश की पीढ़ा छुपी रही, इन बकवास अखबारों में.
लूट रहा है हर एक नेता, लूट रहा हर वासी भी,
खा रहा आदमी आदमी को, भूख से इन पैसो की.
क्या पाया इस देश ने आज, आज़ादी से चलते-चलते.
मेरा देश है महान, गर्व मुझको है इसपर,
झुका हुआ है पर यह शीश, इस के फिसले राहो पर.
KAL,AAJ AUR KAL
PAL PAL JEE RAHA HU KAL KEE AASHA MEIN
BHATAK RAHA HU BICHDE KAL KE ANDHERON MEIN
BEETA PAL TO GUZAR GAYA PAANI KI LAHARON SA
LIYE BAITHA HU USE PAHALWAAN KI EK PAKAD SA
GUSSA AUR NAFRAT SE BHARA JEEVAN KI RAAHON KO
ATEET KE SHOLE SE JALAYA IS PAL KE PHOOLON KO
AAS LIYE KAL KE SURAJ KA, BEETA AAJ AKELE MEIN
BHOOLA IS PAL KI SAAWAN KO, KAHI DOOR GAGAN KI CHAAHAT MEIN
INDRADANUSH TO DOOR HI HAI, KABHI NA AAYA PAKADO MEIN
RANG PADA HAI KADMO PE, NAHI JHUKAAYA NAZROON KO
KYU BHULA MEIN, IN PYAASI RAAHO MEIN
AAJ KA DIN TO BADA HAI SABSE
LE HOTE PE HANSI, AUR DIL ME PYAAR
RASTOO PE BICHA DE PHOOL HAZAAR
BAN JA TU HAR INSAAN KA PREET
MUSHKIL KA HAR TU BAN JA JEET
MITA KHUSHI SE AANSOO KO APNE
AUR DE HAR AANKH KO HASEEN SAPNE
CHOTI ZINDAGI HAI BITANI IN RAAHO PAR
NAFRAT KE SHOLE SA NA TU INHE BHAR
HAR JEEVI KA TU AAJ BANKAR MEET
UTHA KADAM BANANE AAJ KHUDA KA PREET
PAL PAL JEE RAHA HU KAL KEE AASHA MEIN
BHATAK RAHA HU BICHDE KAL KE ANDHERON MEIN
A disaster has struck Nepal
People are in a lot of suffering
The world is trying to do its bit
Calamities do not see the religion
Calamities do not see the caste
It is only making a man run in despair
Foolish they are saying that as man runs
There is no need for religion
It is indeed some kind of weird logic
God is what we seek through religion
Religion is the route to an inner peace
To deal with the external world
The destination of religion is the God inside
The nature outside is another journey
Subjected to cause and effect in the realms of space, matter and time
There are all reasons to feel sad for the calamities outside
It requires a mass sympathy and physical help to pull out the troubled
An individual man needs to help in whatever way
But to blame God or to abuse religion during acts of nature is a silly mind
A calamity if proves that there is no God
Then everything good also proves God and religion
Good and bad are the ways of the world
A man gets trapped and acts in the good and bad
The search for God is religion
The search for God is above good and bad
The search for God is above space and time
A calamity which kills should not shake a man out of religion as some would want
It would give the strength to cope with the tragedy
It would be the bearer of hope to a troubled mind
So do not link God with wars
Do not link God to Nepal
These are unfortunate disasters and do not bring religion in the way to Nepal
Forgive and forget
That is the way to life
Love and live
That is the way to life
Live and let live
That is the way to life
There is no religion
There is no work
There is no dharma
There is no God outside
Just live your life
Just live with love
And do your work
Accept all the disagreements
Accept all the good and the bad and the ugly
There is no fight
There is no right
All have a right to live
All have a right to love
Live and let live
Forgive and forget
Live every moment
Live every breath
There is no past
There is no future
It is all the present
It is all love
It is always you
It never was anything else
There was never a you
There was never a God
That is the art of living
That is way to salvation.
अजीब सा है जीव की आवेदना
तड़प रहा है आदमी बेचैन सा
मर्ज़ी से बुना है जाल मकड़ी सा
दर्द से है चीकता जब फसे मजबूर सा.
छूटने की कोशिश मे बिताये हर सांस को
हर ज़ोर लगा इस दर्द-ए-जाल को तोड़ने को
खुशी सा झूमता है जब छोड़ा इस की पकड़ को
मूर्ख ना समझा इस जाल के शिल्पकार को
ख्वाब हैं हसीन सा वो प्यार का
ना कभी रहा दर्द के नाम का
दिल के राहो में बसा प्यार तो अनंत सा
दूर है वह चला एक बेमिसाल मूर्ख सा.
भगवान को तो कभी इंसान ने इंकार किया
प्यार को कभी तूने क्या इंकार किया
रूप दिए हज़ार तूने इस पाक से प्यार को
देख रहा है गहनो को भूल के उस स्वर्ण को